Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 35
Right of private defence of body and of property
Every person has a right, subject to the restrictions contained in section 37, to defend—
(a) his own body, and the body of any other person, against any offence affecting the human body;
(b) the property, whether movable or immovable, of himself or of any other person, against any act which is an offence falling under the definition of theft, robbery, mischief or criminal trespass, or which is an attempt to commit theft, robbery, mischief or criminal trespass.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दंड विधि में लंबे समय से मान्य सिद्धांत (मूलतः Indian Penal Code, 1860 की धारा 97) को आगे बढ़ाता है कि राज्य हर नागरिक की तात्कालिक रक्षा हर समय नहीं कर सकता, इसलिए कानून व्यक्ति को आत्मरक्षा और दूसरों व संपत्ति को चल रहे आपराधिक नुकसान से बचाने की अनुमति देता है। यह विचार दर्शाता है कि निजी प्रतिरक्षा (private defence) राज्यीय सुरक्षा के तुरंत उपलब्ध न होने पर एक सुरक्षा-वाल्व है, परंतु भीड़-न्याय रोकने के लिए इसे जानबूझकर संकीर्ण और शर्तबद्ध रखा गया है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (IPC धारा 97) के अंतर्गत भारतीय न्यायालय लगातार मानते रहे कि निजी प्रतिरक्षा का अधिकार दंडात्मक नहीं बल्कि निवारक है — यह आसन्न खतरे को टालने के लिए होता है, न कि ख़तरा समाप्त होने के बाद प्रतिशोध के लिए। सर्वोच्च न्यायालय ने Darshan Singh v. State of Punjab (2010) जैसे मामलों में स्पष्ट किया कि यह अधिकार उस व्यक्ति को भी उपलब्ध है जो भाग सकता था, और रक्षक को अपनी प्रतिक्रिया को ‘सोने के तराजू’ में तोलने की जरूरत नहीं, यद्यपि प्रतिक्रिया वर्तमान धारा 37 में निहित प्रतिबंधों (अनुपातिकता और राज्य सहायता के अभाव) के भीतर ही रहनी चाहिए। ये व्याख्यात्मक सिद्धांत अपेक्षित हैं कि BNS की धारा 35 के अनुप्रयोग को आगे भी मार्गदर्शित करेंगे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: आप इस अधिकार के तहत अपनी या अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए असीमित बल का उपयोग कर सकते हैं।
तथ्य: यह अधिकार स्पष्ट रूप से ‘धारा 37 में निहित प्रतिबंधों के अधीन’ है, अर्थात् कब और कितना बल इस्तेमाल किया जा सकता है, इस पर सीमाएँ हैं।
मिथक: निजी प्रतिरक्षा केवल आपके अपने शरीर या आपकी अपनी संपत्ति की ही रक्षा करती है।
तथ्य: कानून साफ़ तौर पर यह भी अनुमति देता है कि आप किसी अन्य व्यक्ति के शरीर या किसी अन्य की संपत्ति की भी रक्षा कर सकते हैं, न कि केवल अपनी ही।
मिथक: यह अधिकार संपत्ति के विरुद्ध किसी भी प्रकार के कदाचार पर लागू होता है।
तथ्य: यह विशेष रूप से चोरी, डकैती, शरारत या आपराधिक अतिक्रमण (या इनके प्रयास) जैसे कृत्यों पर लागू होता है, न कि हर तरह के संपत्ति-विवाद पर।