Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 22
Act of a person of unsound mind
Nothing is an offence which is done by a person who, at the time of doing it, by reason of unsoundness of mind, is incapable of knowing the nature of the act, or that he is doing what is either wrong or contrary to law.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम पुराने अंग्रेज़ी ‘एम’नॉटन नियम’ (1843) से आया है, जो एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति डैनियल एम’नॉटन पर हत्या के मुक़दमे के बाद विकसित एक विधिक कसौटी थी। विचार यह है कि आपराधिक दंड उन्हीं के लिए है जो सही और गलत के बीच चयन कर सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति का मस्तिष्क इतना विक्षुब्ध हो कि वह अपने कृत्यों को समझ न सके या यह न जान सके कि वे गलत हैं, तो उसे दंडित करना निरर्थक और अन्यायपूर्ण है। यही सिद्धांत भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 84 में समाहित था, और अब वही शब्दावली व अर्थ के साथ भारत की दंड संहिता, 2023 की धारा 22 में पुनः अधिनियमित किया गया है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने समान पूर्व प्रावधान (आईपीसी धारा 84) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि ‘मति-अस्वस्थता’ एक विधिक धारणा है, केवल चिकित्सकीय नहीं। हर मानसिक बीमारी इसके अंतर्गत नहीं आती; यह सिद्ध होना चाहिए कि ठीक कृत्य के समय अभियुक्त कृत्य की प्रकृति जानने या यह समझने में असमर्थ था कि वह गलत या अवैध है। न्यायालयों ने माना है कि इस उन्माद/मति-अस्वस्थता को सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर है; मात्र असामान्यता, सनक, या मानसिक रोग का इतिहास पर्याप्त नहीं; तथा कृत्य से पहले, दौरान और बाद के आचरण (जैसे सबूत छिपाना या भागना) से न्यायाधीश यह परख सकते हैं कि वास्तविक अक्षमता थी या नहीं। सुरेन्द्र मिश्रा बनाम स्टेट ऑफ झारखण्ड तथा बापू बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान जैसे मामलों में इस बचाव का मूल्यांकन चिकित्सकीय व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को साथ रखकर करने के तरीके पर चर्चा की गई है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: मानसिक बीमारी या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का इतिहास रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने आप अपराध के दंड से बच जाता है — ऐसा नहीं है।
तथ्य: न्यायालय यह प्रमाण चाहते हैं कि ठीक कृत्य के समय व्यक्ति कृत्य की प्रकृति समझने या यह जानने में असमर्थ था/थी कि वह गलत या अवैध है — केवल मानसिक बीमारी का इतिहास पर्याप्त नहीं।
मिथक: उन्माद का दावा करना सज़ा से बच निकलने का आसान तरीका है — यह धारणा गलत है।
तथ्य: अभियुक्त पर मति-अस्वस्थता सिद्ध करने का भार होता है, और न्यायालय चिकित्सकीय साक्ष्य तथा कृत्य से पहले, दौरान और बाद के आचरण की कड़ी जाँच-पड़ताल करते हैं।
मिथक: मति-अस्वस्थता के कारण दोषमुक्त पाया जाना मतलब तुरंत मुक्त होकर चले जाना — यह सही नहीं है।
तथ्य: न्यायालय अक्सर ऐसे व्यक्तियों को मुक्त करने के बजाय मनोचिकित्सकीय अभिरक्षा या उपचार संस्थानों में रखने का आदेश देते हैं।