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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 20

Act of a child under seven years of age

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम भारतीय दंड संहिता, 1860 (धारा 82) के लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत को आगे बढ़ाता है, जिसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 में समाहित किया गया है। यह पुराने अंग्रेज़ी प्रचलित विधि (डोली इन्कैपैक्स [doli incapax]) में निहित उस विचार को दर्शाता है कि बहुत छोटे बच्चों में अपराध करने का आशय (आपराधिक मंशा) बनाने की मानसिक परिपक्वता नहीं होती। हर बच्चे की समझ को मामले-दर-मामला जाँचना न्यायालयों से अपेक्षित करने के बजाय, क़ानून सरलता और बच्चों को आपराधिक न्याय प्रणाली से पूरी तरह बचाने के लिए एक निरपेक्ष आयु-सीमा तय कर देता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पुरानी आई.पी.सी. धारा 82 (इस प्रावधान की प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती) के अंतर्गत न्यायालयों ने इसे एक पूर्ण, अप्रमाण्य अवरोध माना: कृत्य कितना भी गंभीर हो या बच्चा कितना भी परिपक्व दिखे, सात वर्ष से कम आयु वाले बच्चे को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। न्यायाधीशों ने लगातार माना है कि यहाँ आशय या उद्देश्य अप्रासंगिक है—केवल आयु ही सम्पूर्ण प्रतिरक्षा है। चूँकि बी.एन.एस. धारा 20 की भाषा इसी का प्रतिरूप है, वही स्थापित व्याख्या आगे भी जारी रहने की अपेक्षा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सात वर्ष से कम आयु के बच्चे को तब भी दंडित किया जा सकता है यदि कार्य अत्यन्त गंभीर हो, जैसे किसी की मृत्यु का कारण बनना।

    तथ्य: नहीं—क़ानून कृत्य की गंभीरता के लिए कोई अपवाद नहीं बनाता; सात वर्ष से कम आयु का बच्चा इस धारा के तहत ‘अपराध’ कर ही नहीं सकता।

  • मिथक: इसका अर्थ यह है कि बच्चे के परिवार को भी कोई परिणाम नहीं झेलने पड़ेंगे।

    तथ्य: यह प्रावधान केवल बच्चे को आपराधिक दायित्व से बचाता है; यह दीवानी उत्तरदायित्व (जैसे क्षतिपूर्ति) पर, जो अभिभावकों पर पृथक रूप से आ सकता है, प्रभाव नहीं डालता।