Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 195
Assaulting or obstructing public servant when suppressing riot, etc
(1) Whoever assaults or obstructs any public servant or uses criminal force on any public servant in the discharge of his duty as such public servant in endeavouring to disperse an unlawful assembly, or to suppress a riot or affray, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, or with fine which shall not be less than twenty-five thousand rupees, or with both.
(2) Whoever threatens to assault or attempts to obstruct any public servant or threatens or attempts to use criminal force to any public servant in the discharge of his duty as such public servant in endeavouring to disperse an unlawful assembly, or to suppress a riot or affray, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता (Section 152) के नियम को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य कानून लागू कराने वाले अधिकारियों की उस समय विशेष सुरक्षा करना है जब वे अपनी सबसे जोखिमभरी ड्यूटी—भीड़ों, दंगों और अवैध जमावड़ों पर नियंत्रण—अंजाम दे रहे होते हैं। ऐतिहासिक रूप से ऐसे हालात तेजी से अराजक हो जाते हैं, और व्यवस्था बहाल करने की कोशिश कर रहे अधिकारियों पर हमले हिंसा को और भड़का सकते हैं। कानून अलग से निवारक प्रभाव पैदा करता है, क्योंकि वह भीड़‑नियंत्रण के इन क्षणों में लोक सेवकों को निशाना बनाने को एक विशिष्ट, पृथक अपराध मानता है, जो सामान्य हमला या बाधा से अलग है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पहले के समान आईपीसी प्रावधान के तहत, न्यायालयों ने लगातार माना कि अभियोजन को यह सिद्ध करना होगा कि लोक सेवक अवैध जमावड़ा, दंगा या मारपीट (अफरे) को तितर‑बितर करने से संबंधित आधिकारिक ड्यूटी का निर्वहन कर रहा था—सिर्फ कोई सामान्य पुलिसिंग कार्य नहीं। न्यायालयों ने पूर्ण हुए हमला/बाधा (जिस पर अधिक कठोर दंड लगता है) और मात्र धमकी या प्रयास (जिस पर हल्का दंड लगता है) के बीच भी भेद किया है, और यह रेखांकित किया है कि आशय और वास्तविक आचरण, लागू की गई विशेष उपधारा के अनुरूप होना चाहिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कानून किसी भी समय किसी भी पुलिसकर्मी के साथ होने वाले हर प्रकार के अवरोध पर लागू होता है।
तथ्य: यह विशेष रूप से तभी लागू होता है जब लोक सेवक अवैध जमावड़ा तितर‑बितर करने या दंगा या मारपीट (अफरे) को रोकने की ड्यूटी कर रहा हो—सामान्य पुलिसिंग कार्यों पर नहीं।
मिथक: सिर्फ गुस्से में पुलिस पर चिल्ला देना अपने‑आप उसी सजा को आमंत्रित करता है जो उन्हें शारीरिक रूप से निशाना बनाने पर मिलती है।
तथ्य: कानून वास्तविक हमला/बल प्रयोग (धारा 195(1), कड़ी सजा) और मात्र धमकी या प्रयास (धारा 195(2), हलकी सजा) में साफ फर्क करता है।