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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 194

Affray

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान ब्रिटिश कालीन भारतीय कानून से चली आ रही व्यवस्था को आगे बढ़ाता है (यह पुराने Indian Penal Code, 1860 की धाराओं 159–160 के अनुरूप है)। उद्देश्य साझा सार्वजनिक स्थानों में हाथापाई और झगड़ों को हतोत्साहित कर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है। यह छोटे-मोटे सार्वजनिक झगड़ों को निशाना बनाता है—गंभीर मारपीट या दंगा जैसी घटनाएँ अलग, कड़े कानूनों के तहत आती हैं—क्योंकि छोटी गड़बड़ियाँ भी राहगीरों को डराती हैं और समुदाय की शांति को खतरे में डालती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने परंपरागत रूप से माना है कि अफरे (affray) के लिए (1) कम-से-कम दो व्यक्तियों के बीच वास्तविक शारीरिक लड़ाई होना (केवल ज़बानी झगड़ा नहीं), (2) लड़ाई का सार्वजनिक स्थान पर होना, और (3) उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक शांति का भंग होना—ये तत्व आवश्यक हैं। न्यायालयों ने अफरे को दंगे जैसे अधिक गंभीर अपराधों से अलग माना है (दंगे में पाँच या अधिक लोग और अवैध जमावड़ा आवश्यक होता है) तथा सरल आक्रमण से भी अलग (जो दो लोगों के बीच निजी स्थान पर भी हो सकता है)। यह अपराध हल्का और समझौता-योग्य माना गया है, जो इसकी न्यूनतम अधिकतम सज़ा को दर्शाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अफरा (affray) केवल बड़े समूह के दंगों पर ही लागू होता है।

    तथ्य: अफरा (affray) में केवल दो लोगों की लड़ाई भी आ सकती है; इसमें दंगे जैसी बड़ी भीड़ की आवश्यकता नहीं होती।

  • मिथक: सार्वजनिक जगह पर कोई भी बहस या केवल ज़बानी झड़प अफरा (affray) मानी जाती है।

    तथ्य: न्यायालयों ने इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए कहा है कि इसमें वास्तविक शारीरिक लड़ाई आवश्यक है, केवल चिल्लाना या ज़बानी विवाद पर्याप्त नहीं है।

  • मिथक: अफरे (affray) के आरोप लगते ही हमेशा जेल हो जाती है।

    तथ्य: कानून जेल, जुर्माना, या दोनों की अनुमति देता है—और हल्की, गैर-हिंसक हाथापाई के मामलों में न्यायालय अक्सर केवल जुर्माना ही लगाते हैं।