Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 18
Accident in doing a lawful act
Nothing is an offence which is done by accident or misfortune, and without any criminal intention or knowledge in the doing of a lawful act in a lawful manner by lawful means and with proper care and caution. Illustration. A is at work with a hatchet; the head flies off and kills a man who is standing by. Here, if there was no want of proper caution on the part of A, his act is excusable and not an offence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
दण्ड विधि सामान्यतः अपराधी मनोभाव—अपराध करने का इरादा या उसका ज्ञान (मेंस रिया [mens rea])—के लिए दण्डित करती है। भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 80 से आगे बढ़ाई गई यह व्यवस्था, और भारतीय़ न्याय संहिता, 2023 में समाहित, मानती है कि वैध व सावधानीपूर्ण गतिविधि के दौरान हुई वास्तविक दुर्घटनाओं को अपराध नहीं ठहराना चाहिए। यह प्रावधान उन परिणामों के लिए दण्ड से सुरक्षा देता है जिन्हें व्यक्ति न तो पूर्वानुमानित कर सकता था और न ही रोक सकता था, बशर्ते उसका आचरण वैध हो और उसने उचित एहतियात बरता हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, पूर्ववर्ती IPC की समान धारा 80 की व्याख्या करते हुए, निरन्तर माना है कि यह बचाव तभी लागू होता है जब कृत्य स्वयं वैध हो, वैध तरीके से, वैध साधनों से, और उचित सतर्कता के साथ किया गया हो—दुर्घटना का अपवाद लापरवाही या उतावलेपन की रक्षा नहीं करता। न्यायालयों ने कुल्हाड़ी के उदाहरण तथा समान तथ्य-परिस्थितियों (जैसे खेल, काम या सामान्य गतिविधि के दौरान हुई आकस्मिक मृत्यु) में यह परखा है कि क्या उस स्थिति में एक समझदार व्यक्ति जितनी सावधानी बरतता, उतनी सावधानी वास्तव में बरती गई। यदि किसी भी प्रकार की असावधानी सिद्ध हो, तो यह बचाव विफल होता है और सामान्य आपराधिक दायित्व के नियम लागू होते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: किसी भी दुर्घटना का होना अपने-आप सज़ा से मुक्ति दे देता है।
तथ्य: यह बचाव तभी लागू होता है जब मूल कृत्य वैध हो, वैध तरीके से किया गया हो, और उचित सावधानी बरती गई हो। यदि लापरवाही या असावधानी रही हो, तो यह धारा व्यक्ति की रक्षा नहीं करती।
मिथक: इस धारा का अर्थ है कि घायल व्यक्ति को बिल्कुल भी कोई उपाय नहीं मिलता।
तथ्य: यह प्रावधान केवल आपराधिक दायित्व हटाता है; तथ्यों के आधार पर पीड़ित पक्ष अभी भी मुआवज़े के लिए दीवानी दावा कर सकता है।