Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 16
Act done pursuant to judgment or order of Court
Nothing which is done in pursuance of, or which is warranted by the judgment or order of, a Court; if done whilst such judgment or order remains in force, is an offence, notwithstanding the Court may have had no jurisdiction to pass such judgment or order, provided the person doing the act in good faith believes that the Court had such jurisdiction.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान उन लोगों की रक्षा करता है — जैसे पुलिस अधिकारी, कारागार अधीक्षक, या न्यायालय कर्मचारी — जो सच्ची नीयत में न्यायाधीश के आदेश का पालन करते हैं। कभी‑कभी न्यायालय अपनी अधिकारिता (जूरिस्डिक्शन) के बारे में भूल कर सकते हैं, और केवल इस कारण कि किसी ने विधिसम्मत मानकर न्यायालय के आदेश का पालन किया, उसे दंडित करना अनुचित होगा। यह नियम न्यायालयी आदेशों के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित करता है, साथ ही अंधी या लापरवाह आज्ञापालन के बजाय वास्तविक सद्भावना की अपेक्षा करता है। यही सिद्धांत पहले के Indian Penal Code, 1860 (Section 78) में था, जिसे Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में आगे बढ़ाया गया है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
Indian Penal Code के समकक्ष प्रावधान (Section 78) के अंतर्गत, भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि यह सुरक्षा स्वतः नहीं मिलती — व्यक्ति को यह दिखाना होता है कि उसे वास्तव में सद्भावना से न्यायालय की अधिकारिता पर विश्वास था, केवल इतना नहीं कि कोई आदेश मौजूद था। न्यायालय यह भी परखते हैं कि व्यक्ति ने यथोचित सावधानी और ध्यान से काम किया या नहीं, और क्या उस स्थिति में एक समझदार व्यक्ति यह मानता कि वह न्यायालय ऐसा आदेश पारित करने में सक्षम था। मात्र तकनीकी रूप से आदेश का अस्तित्व उस व्यक्ति की रक्षा नहीं करता जिसने जाना, या जानना चाहिए था, कि न्यायालय के पास ऐसा आदेश जारी करने की शक्ति नहीं थी।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: किसी भी न्यायालय का कोई भी हस्ताक्षरित आदेश, चाहे कुछ भी हो, उसका पालन करने वाले व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा देता है।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि व्यक्ति को सच्चे और युक्तिसंगत रूप से यह मानना चाहिए कि न्यायालय के पास अधिकारिता थी — केवल कागज़ी आदेश के होने से स्वतः संरक्षण नहीं मिल जाता।
मिथक: इस धारा का अर्थ यह है कि न्यायालय अधिकारिता के बारे में कभी ग़लत नहीं हो सकते।
तथ्य: यह धारा मानकर चलती है कि न्यायालय अधिकारिता संबंधी भूल कर सकते हैं; यह केवल उन व्यक्तियों की रक्षा करती है जिन्होंने ऐसे आदेशों पर सद्भावना में कार्य किया हो, न कि स्वयं न्यायालय के निर्णय की।