Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 14
Act done by a person bound, or by mistake of fact believing himself bound, by law
Nothing is an offence which is done by a person who is, or who by reason of a mistake of fact and not by reason of a mistake of law in good faith believes himself to be, bound by law to do it. Illustrations.
(a) A, a soldier, fires on a mob by the order of his superior officer, in conformity with the commands of the law. A has committed no offence.
(b) A, an officer of a Court, being ordered by that Court to arrest Y, and, after due enquiry, believing Z to be Y, arrests Z. A has committed no offence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 76 का ही निरंतरन है, जिसे मकॉले की विधि आयोग ने तैयार किया था। दंड विधि में यह विचार पुराना और सार्वभौमिक है: जो लोग कानूनी कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, या विधि का अनुपालन करने के प्रयास में वास्तविक और युक्तिसंगत तथ्यगत भूल पर कार्य कर रहे हों, उन्हें अपराधी की तरह दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यह उन सैनिकों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की रक्षा करता है जो वैध अधिकार के अधीन सद्भावना में कार्य करते हैं, साथ ही यह स्पष्ट करता है कि स्वयं विधि के अज्ञान का कभी बहाना नहीं बन सकता।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
ठीक इसी IPC धारा 76 के अंतर्गत, न्यायालयों ने कहा है कि तथ्य की भूल ईमानदार और युक्तिसंगत होनी चाहिए—सिर्फ़ दावा करना पर्याप्त नहीं—और व्यक्ति को सचमुच यह विश्वास होना चाहिए कि वह विधि से बंधा था। न्यायालयों ने इसे धारा 79 (यह विश्वास कि कृत्य विधि द्वारा न्यायोचित है) से अलग बताया है, और उन स्थितियों पर ध्यान केंद्रित किया है जहाँ व्यक्ति स्वयं को बाध्य/विवश मानता है, जैसे विधि-सम्मत आदेशों का पालन करते सैनिक या वारंट निष्पादित करते अधिकारी। इस विश्वास की युक्तिसंगतता और समुचित सावधानी (जैसे गिरफ़्तारी वाले उदाहरण में) का मूल्यांकन प्रत्येक मामले के तथ्यों पर होता है; लापरवाही से या अविवेकी ढंग से हुई भूल इस सुरक्षा के अंतर्गत नहीं आती।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा आपको ‘मुझे पता नहीं था कि यह गैरकानूनी है’ जैसा बचाव उठाने देती है।
तथ्य: यह धारा स्पष्ट रूप से विधि की भूल को बाहर रखती है—केवल तथ्यों की भूल (जैसे किसी व्यक्ति की पहचान में चूक) ही क्षम्य हो सकती है, और विधि का अज्ञान कभी मान्य बहाना नहीं है।
मिथक: कोई भी भूलभुलैया-भरा विश्वास, चाहे जितना लापरवाह क्यों न हो, इस धारा के अंतर्गत संरक्षित है।
तथ्य: न्यायालय अपेक्षा करते हैं कि भूल से बना विश्वास सद्भावना में हो और युक्तियुक्त सावधानी या जाँच-पड़ताल के बाद बना हो, जैसा उस दृष्टांत में दर्शाया गया है जहाँ अधिकारी ‘समुचित जाँच’ करने के बाद भी ग़लत व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लेता है।