Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 13
Enhanced punishment for certain offences after previous conviction
Whoever, having been convicted by a Court in India, of an offence punishable under Chapter X or Chapter XVII of this Sanhita with imprisonment of either description for a term of three years or upwards, shall be guilty of any offence punishable under either of those Chapters with like imprisonment for the like term, shall be subject for every such subsequent offence to imprisonment for life, or to imprisonment of either description for a term which may extend to ten years.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता की दीर्घकालिक धारणा को आगे बढ़ाता है (धारा 75 इसी विषय को कवर करती थी) कि संपत्ति-संबंधी तथा सिक्का/दस्तावेज़-संबंधी गंभीर अपराधों में अभ्यस्त या पुनरावृत्ति करने वाले अपराधियों को पहली बार अपराध करने वालों की तुलना में कड़ी सजा मिलनी चाहिए। तर्क यह है कि एक बार गंभीर सजा पाकर भी जब व्यक्ति पुनः वैसा ही गंभीर अपराध करता है, तो यह ऐसा पैटर्न दर्शाता है जिसे सामान्य सजा पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर सकती; इसलिए ऐसे दोहराए गए आचरण के लिए कानून न्यायाधीशों को कहीं अधिक कठोर दंड देने की अनुमति देता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
यह धारा दण्ड संहिता की पुरानी धारा 75 से काफ़ी मेल खाती है और उस प्रावधान की व्याख्या करते समय न्यायालयों ने कठोर प्रमाण की माँग की: पूर्व दोषसिद्धि वस्तुतः निर्दिष्ट अध्यायों के अंतर्गत, तथा तीन वर्ष या उससे अधिक की सजा-योग्य अपराध के लिए होनी चाहिए; और नया अपराध भी वही शर्तें पूरी करे। न्यायालय इस बात पर सतर्क रहे कि संवर्धित सजा विवेकाधीन है (ऊपरी सीमा है, अनिवार्य नहीं), और अभियोजन को संवर्धित सजा-सीमा लागू करने से पहले पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य और वैधता स्पष्ट रूप से सिद्ध करनी होगी। क्योंकि भारतीय दंड संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) नई है, अपेक्षा है कि न्यायालय इस प्रावधान पर भी समान तर्क लागू करेंगे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा किसी भी दोहराए गए अपराध पर लागू होती है, चाहे वह कितना भी छोटा हो।
तथ्य: यह केवल सन्हिता के अध्याय X और अध्याय XVII के अंतर्गत आने वाले वे विशिष्ट गंभीर अपराधों पर लागू होती है, जिनकी सजा तीन वर्ष या उससे अधिक है—न कि छोटे या असंबंधित अपराधों पर।
मिथक: जब कोई पुनः अपराध करता है तो संवर्धित सजा (आजन्म कारावास या दस वर्ष) अनिवार्य रूप से देनी ही पड़ती है।
तथ्य: यह धारा केवल एक ऊपरी सीमा निर्धारित करती है जिसे न्यायालय लगा सकते हैं; यह न्यायाधीशों को विवेकाधिकार देती है, न कि स्वतः सबसे कड़ी सजा थोपती है।