Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 10
Punishment of person guilty of one of several offences, judgment stating that it is doubtful
In all cases in which judgment is given that a person is guilty of one of several offences specified in the judgment, but that it is doubtful of which of these offences he is guilty, the offender shall be punished for the offence for which the lowest punishment is provided if the same punishment is not provided for all.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम उस मूल सिद्धांत की रक्षा करता है कि दंड सिद्ध दोष के अनुपात में होना चाहिए। जब सबूत स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति ने कुछ गलत किया है पर कुछ संबंधित अपराधों में से ठीक कौन‑सा किया, यह तय नहीं होता, तो क़ानून कड़े अनुमान नहीं लगाता। इसके बजाय, संदेह का लाभ अभियुक्त को देकर सबसे हलकी लागू सज़ा लगाई जाती है। यह व्यापक फौजदारी सिद्धांत का प्रतिबिंब है कि अनिश्चितता अभियुक्त के हित में जानी चाहिए, और यह लगभग शब्दशः भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 72 से नए भारतीय न्याय संहिता, 2023 में आगे बढ़ाई गई है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने ऐतिहासिक रूप से इस प्रावधान को वैकल्पिक आरोपों वाले मुकदमों में लागू किया है—जैसे जब साक्ष्य चोरी या चोरी का माल जानते‑बूझते रखना, दोनों में किसी एक का समर्थन करते हों लेकिन कौन‑सा, यह स्पष्ट न हो; या जब मृत्यु दंडनीय लापरवाही से हुई हो या किसी कम गम्भीर चोट के अपराध से—यह तय न हो। न्यायालयों ने निरन्तर माना है कि यह धारा तभी लागू होती है जब पूर्ण सुनवाई के बाद विशिष्ट नामित अपराधों के बीच वास्तविक, तार्किक संदेह शेष रहे—यह साक्ष्य‑विश्लेषण से बचने का शॉर्टकट नहीं, बल्कि वही दुर्लभ स्थिति होने पर लागू ‘फॉलबैक’ नियम है जहाँ समग्र साक्ष्य दोष सिद्ध करते हैं पर एक सटीक अपराध निर्धारित नहीं हो पाता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा न्यायालयों को बिना किसी विशिष्ट अपराध को सिद्ध किए ही दोषसिद्धि करने देती है।
तथ्य: फिर भी न्यायालय को संदेह से परे यह मानना होगा कि व्यक्ति ने नामित अपराधों में से किसी एक को किया है; केवल यह चयन अनिश्चित रह सकता है कि विशिष्ट रूप से कौन‑सा अपराध सिद्ध हुआ।
मिथक: यह प्रावधान हर धुँधले मामले में अपने‑आप सज़ा कम कर देता है।
तथ्य: इसका दायरा सीमित है—केवल तब जब निर्णय में विशिष्ट वैकल्पिक अपराधों को नामित किया गया हो और उन्हीं के बीच संदेह हो; साधारण रूप से अस्पष्ट या अपर्याप्त साक्ष्य वाले मामलों में यह लागू नहीं होता।