The Constitution of India
अनुच्छेद 96
जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना— (1) लोक सभा की किसी बैठक में, जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष, या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी, पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 95 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है । (2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प लोक सभा में विचाराधीन है तब उसको लोक सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह अनुच्छेद 100 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमतः ही मत देने का हकदार होगा, किन्तु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
निर्माताओं का उद्देश्य स्पष्ट हित-संघर्ष को रोकना था: सभापति (या उपसभापति) को अपने ही हटाने पर होने वाली बहस को नियंत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह अध्यक्ष के प्रक्रमगत अधिकारों का दुरुपयोग कर स्वयं को बचा सकता है। साथ ही, चूँकि वह सदन का निर्वाचित सदस्य है और पद वास्तव में हटाया जाने तक रिक्त नहीं होता, अतः उसे एक सांसद के मूल अधिकार बने रहते हैं—बोलना, अपना पक्ष रखना और सामान्य मत देना—परंतु अध्यक्षता से मिलने वाला विशेष समानता-भंग करने वाला अतिरिक्त मत उससे हटा लिया जाता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है कि हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत होते ही सभापति के सारे मतदान-अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
तथ्य: वह उस कार्यवाही के दौरान प्रस्ताव या अन्य विषयों पर पहले दौर में सामान्य मतदान कर सकता है; उसे सिर्फ बराबरी की स्थिति तोड़ने वाला विशेष अतिरिक्त मत नहीं मिलता।
मिथक: यह भी गलत है कि अपने हटाने की बहस के दौरान उसे सदन से पूरी तरह बाहर जाना होता है।
तथ्य: वह उपस्थित रह सकता है, बोल सकता है और कार्यवाही में भाग ले सकता है—उसे बस उस विशेष बैठक की अध्यक्षता नहीं करनी है।