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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 79

संसद् का गठन

संसद् का गठन— संघ के लिए एक संसद् होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

निर्माताओं ने आंशिक रूप से ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर पद्धति पर आधारित द्विसदनीय संसद अपनाई, ताकि एक सदन सीधे जनता का प्रतिनिधित्व करे (लोक सभा) और दूसरा राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिक विचारपूर्ण, कम जनोन्मुख समीक्षा प्रदान करे (राज्य सभा)। राष्ट्रपति को संसद का भाग मानना उस ब्रिटिश संवैधानिक परंपरा को दर्शाता है जिसमें राष्ट्राध्यक्ष की स्वीकृति विधेयक के कानून बनने के लिए अनिवार्य होती है, यद्यपि राष्ट्रपति किसी भी सदन में बैठते या मतदान करते नहीं हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः इस अनुच्छेद को संरचनात्मक और परिभाषात्मक माना है, न कि स्वयं विवाद का प्रत्यक्ष स्रोत। संसदीय शक्तियों, विशेषाधिकारों या विधेयकों के पारित होने (जैसे धन विधेयक या विधि-निर्माण में राष्ट्रपति की भूमिका संबंधी प्रकरण) पर विचार करने वाले निर्णय प्रायः यही स्थापित करने से आरंभ होते हैं कि ‘संसद’ में संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति भी शामिल हैं, और राष्ट्रपति की औपचारिक विधायी भूमिका को अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत पृथक रूप से संपादित कार्यपालिका कृत्यों से अलग ठहराते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि राष्ट्रपति संसद से अलग हैं और केवल संसद के निर्णयों को स्वीकृति देते हैं।

    तथ्य: अनुच्छेद 79 स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को संसद का अंग बनाता है, भले ही राष्ट्रपति सदनों में न बैठते हों और न मतदान करते हों; राष्ट्रपति की स्वीकृति विधि-निर्माण प्रक्रिया का संवैधानिक हिस्सा है, कोई बाहरी नियंत्रण नहीं।

  • मिथक: ‘संसद’ केवल लोक सभा और राज्य सभा को नहीं दर्शाती—यह कथन गलत है।

    तथ्य: संवैधानिक रूप से, ‘संसद’ को यह अनुच्छेद राष्ट्रपति सहित दोनों सदनों को सम्मिलित करते हुए परिभाषित करता है।