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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 69

उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान— प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्:— ईश्वर की शपथ लेता हूं “मैं, अमुक -----------------------------------------कि मैं विधि द्वारा स्थापित सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूं उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूंगा ।”।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि जो व्यक्ति अस्थायी रूप से राष्ट्रपति का कार्य कर सकता है और जो पदेन राज्यसभा का सभापति होता है, वह किसी भी शक्ति का प्रयोग करने से पहले औपचारिक रूप से संवैधानिक निष्ठा और ईमानदार सेवा का वचन दे। यह अनुच्छेद 60 के अंतर्गत राष्ट्रपति से अपेक्षित शपथ का प्रतिबिंब है, जो निर्माताओं की यह मंशा दर्शाता है कि उच्च संवैधानिक पद एक ही आधारभूत प्रतिज्ञा से बाध्य रहें। धार्मिक (‘ईश्वर के नाम पर शपथ’) और धर्मनिरपेक्ष (‘गंभीरतापूर्वक प्रतिज्ञा’) दोनों विकल्प देना भारत की विविध आस्थाओं और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का सम्मान करता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि उपराष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से ईश्वर का नाम लेकर धार्मिक शपथ ही लेनी होती है।

    तथ्य: संविधान विकल्प देता है: व्यक्ति ‘ईश्वर के नाम पर शपथ’ ले सकता/सकती है या ‘गंभीरतापूर्वक प्रतिज्ञा’ कर सकता/सकती है—एक ही वादे की धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, दोनों अभिव्यक्तियाँ मान्य हैं।

  • मिथक: कोई भी अधिकारी यह शपथ नहीं दिला सकता—ऐसा कहना गलत है।

    तथ्य: यह शपथ केवल भारत के राष्ट्रपति के समक्ष, या इस उद्देश्य के लिए राष्ट्रपति द्वारा विशेष रूप से नियुक्त व्यक्ति के समक्ष ही दिलाई जा सकती है; किसी भी यादृच्छिक अधिकारी के समक्ष नहीं।