The Constitution of India
अनुच्छेद 42
काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध
काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध— राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अनुच्छेद 42 राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है, जिसे संविधान-निर्माताओं ने अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सामाजिक न्याय की धारणाओं से प्रेरित होकर जोड़ा। यह विशेषकर महिलाओं सहित कामगारों को बीसवीं सदी के आरंभ में प्रचलित शोषणकारी औद्योगिक परिस्थितियों से बचाने की चिंता को दर्शाता है, और मातृत्व संरक्षण व मानवीय श्रम प्रथाओं के समर्थन में वैश्विक पहल (जैसे ILO) के साथ सामंजस्य रखता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने अनुच्छेद 42 का उपयोग श्रम कल्याण संबंधी कानूनों की व्याख्या और सुदृढ़ीकरण के लिए किया है, खासकर मातृत्व लाभ के मामलों में। Municipal Corporation of Delhi v. Female Workers (Muster Roll) (2000) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मातृत्व लाभ अधिनियम के लाभ दैनिक-मजदूरी या मस्टर-रोल पर कार्यरत महिला कामगारों तक भी विस्तृत होने चाहिए, और इस उद्देश्यपूर्ण, कल्याणोन्मुखी व्याख्या के समर्थन में अनुच्छेद 42 का सहारा लिया। यद्यपि यह प्रावधान अपने आप में सीधे अदालत में प्रवर्तनीय नहीं है, फिर भी न्यायालय सामान्यतः इसे श्रम व सामाजिक कल्याण विधानों की व्याख्या हेतु मार्गदर्शक सिद्धांत मानते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 42 कामगारों को मातृत्व लाभ के लिए सीधे मुकदमा करने का विधिक अधिकार देता है।
तथ्य: यह एक नीति-निदेशक सिद्धांत है, यानी यह सरकार की नीतियों और कानून-निर्माण का मार्गदर्शन करता है, पर अपने आप अदालत में सीधे प्रवर्तनीय नहीं है; वास्तविक अधिकार मातृत्व लाभ अधिनियम जैसे कानूनों से मिलते हैं।
मिथक: यह अनुच्छेद केवल औपचारिक, स्थायी कर्मचारियों पर ही लागू होता है।
तथ्य: उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णयों में देखा गया है कि इसकी भावना के आधार पर मातृत्व संरक्षण अनौपचारिक या दैनिक-मजदूरी कामगारों तक भी विस्तारित किया गया है।