The Constitution of India
अनुच्छेद 392
कठिनाइयों को दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति
कठिनाइयों को दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति— (1) राष्ट्रपति, किन्हीं ऐसी कठिनाइयों को, जो विशिष्टतया भारत शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों से इस संविधान के उपबंधों को संक्रमण के संबंध में हों, दूर करने के प्रयोजन के लिए आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि यह संविधान उस आदेश में विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान उपांतरण, परिवर्धन या लोप के रूप में ऐसे अनुकूलनों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगा जो वह आवश्यक या समीचीन समझे: परंतु ऐसा कोई आदेश भाग 5 के अध्याय 2 के अधीन सम्यक् रूप से गठित संसद् के प्रथम अधिवेशन के पश्चात् नहीं किया जाएगा । (2) खंड (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के समक्ष रखा जाएगा । (3) इस अनुच्छेद, अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 367 के खंड (3) और अनुच्छेद 391 द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्तियां, इस संविधान के प्रारंभ से पहले, भारत डोमिनियन के गवर्नर जनरल द्वारा प्रयोक्तव्य होंगी । संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, 1हिंदी में प्राधिकृत पाठ] और निरसन
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
1949-50 में संविधान अपनाते समय भारत शासन भारत अधिनियम, 1935 के अधीन औपनिवेशिक शासन से एक बिल्कुल नये संवैधानिक ढाँचे में जा रहा था। निर्माताओं ने आशंका जताई थी कि इस हस्तांतरण में तकनीकी अड़चनें, रिक्तताएँ या असंगतियाँ सामने आ सकती हैं—जैसे न्यायालयों, सेवाओं या पुराने क़ानूनों की अंतरिम व्यवस्थाएँ—जिन्हें पहले से पूरी तरह भाँपा नहीं जा सकता। अनुच्छेद 392 ने ऐसी विघ्नों को कार्यपालिक आदेश से अस्थायी रूप से दूर करने की ‘तुरंत-सुधार’ शक्ति दी, ताकि पूर्ण संवैधानिक संशोधन की जरूरत न पड़े; पर यह केवल अल्प संक्रमण-काल तक सीमित थी और जैसे ही निर्वाचित संसद ने विधिनिर्माण संभाला, यह समाप्त हो गई।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 392 जहाँ भी कोई समस्या हो, राष्ट्रपति को किसी भी समय संविधान बदलने देता है।
तथ्य: यह शक्ति सख्ती से अस्थायी थी और संक्रमण-काल से बँधी थी; पहली निर्वाचित संसद के मिलते ही इसका उपयोग रुक गया और बाद में इसे फिर से चालू नहीं किया जा सकता था।
मिथक: यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को अनुच्छेद 368 के तहत संसद जैसी सतत् संशोधन-शक्ति देता है।
तथ्य: यह प्रावधान केवल शासन भारत अधिनियम, 1935 से नये संविधान में संक्रमण को सुचारु करने के लिए संकीर्ण अनुकूलन की अनुमति देता था, सामान्य संवैधानिक संशोधन की नहीं, और इसके तहत जारी आदेशों को संसद के समक्ष रखना अनिवार्य था।