The Constitution of India
अनुच्छेद 371H
अरुणाचल प्रदेश राज्य के संबंध में विशेष उपबंध
अरुणाचल प्रदेश राज्य के संबंध में विशेष उपबंध— इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,— (क) अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल का अरुणाचल प्रदेश राज्य में विधि और व्यवस्था के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व रहेगा और राज्यपाल, उस संबंध में अपने कृत्यों का निर्वहन करने में की जाने वाली कार्रवाई के बारे में अपने व्यक्तिगत निर्णय का प्रयोग मंत्रि-परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् करेगा: परंतु यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई मामला ऐसा मामला है या नहीं जिसके संबंध में राज्यपाल से इस खंड के अधीन अपेक्षा की गई है कि वह अपने व्यक्तिगत निर्णय का प्रयोग करके कार्य करे तो राज्यपाल का अपने विवेक से किया गया विनिश्चय अंतिम होगा और राज्यपाल द्वारा की गई किसी बात की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि उसे अपने व्यक्तिगत निर्णय का प्रयोग करके कार्य करना चाहिए था या नहीं: परंतु यह और कि यदि राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि अब यह आवश्यक नहीं है कि अरुणाचल प्रदेश राज्य में विधि और व्यवस्था के संबंध में राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व रहे तो वह, आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगा कि राज्यपाल का ऐसा उत्तरदायित्व उस तारीख से नहीं रहेगा जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए; (ख) अरुणाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा कम से कम तीस सदस्यों से मिलकर बनेगी ।]
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अरुणाचल प्रदेश, जिसे पहले नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) कहा जाता था, चीन की निकटता और विविध जनजातीय आबादी तथा सीमित प्रशासनिक ढाँचे के कारण सामरिक रूप से संवेदनशील सीमा क्षेत्र था और केंद्र सरकार द्वारा सीधे प्रशासित किया जाता था। जब राज्य को State of Arunachal Pradesh Act, 1986 (प्रभावी 1987) द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा मिला, तो संसद ने संक्रमण को सुगम बनाने हेतु अनुच्छेद 371H जोड़ा: राज्यपाल को कानून‑व्यवस्था में विशेष, व्यक्तिगत भूमिका दी गई (नगालैंड के लिए अनुच्छेद 371A के अंतर्गत बनी व्यवस्था के समान) ताकि नवनिर्मित सीमा राज्य में सुरक्षा को लेकर दिल्ली आश्वस्त रहे; साथ ही, उसकी कम आबादी के अनुरूप न्यूनतम विधानसभा आकार तय किया गया ताकि विधानमंडल विश्वसनीय रूप से कार्य कर सके।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि राज्यपाल कानून‑व्यवस्था पर मंत्रिपरिषद को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।
तथ्य: राज्यपाल को पहले मंत्रिपरिषद से परामर्श अवश्य करना होता है; केवल कार्रवाई पर अंतिम निर्णय राज्यपाल के व्यक्तिगत विवेक द्वारा किया जाता है।
मिथक: यह विशेष शक्ति स्थायी है और कभी समाप्त नहीं की जा सकती—यह कथन गलत है।
तथ्य: राष्ट्रपति, जब संतुष्ट हो जाएँ कि इसकी आवश्यकता नहीं रही, तो औपचारिक आदेश द्वारा किसी भी समय राज्यपाल की कानून‑व्यवस्था संबंधी विशेष जिम्मेदारी समाप्त कर सकते हैं।
मिथक: यह कहना गलत है कि न्यायालय यह जाँच सकते हैं कि किसी प्रकरण में राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत निर्णय का उपयोग उचित था या नहीं।
तथ्य: यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि इस प्रश्न पर राज्यपाल का स्वयं का निर्णय अंतिम होगा और न्यायालय में चुनौती योग्य नहीं होगा।