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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 37

इस भाग में अंतर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना

इस भाग में अंतर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना— इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किंतु फिर भी इनमें अधिकथित तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्त्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक व आर्थिक लक्ष्यों—जैसे गरीबी घटाना, स्वास्थ्य सुनिश्चित करना और जन-कल्याण बढ़ाना—को दर्ज करना चाहा, पर हर वादे को तुरंत विधिक रूप से लागू योग्य नहीं बनाया, क्योंकि नवस्वतंत्र देश के पास उन्हें तत्काल सुनिश्चित करने के संसाधन नहीं थे। अनुच्छेद 37 आकांक्षा और व्यवहारिकता में संतुलन बनाता है: यह नीति-निर्देशक तत्वों को विधायकों के लिए नैतिक व नीतिगत दिशा-सूचक बनाए रखता है, जबकि विधिक रूप से लागू योग्य अधिकारों को मूल अधिकारों (भाग III) के लिए सुरक्षित रखता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने लगातार माना है कि नीति-निर्देशक तत्व सीधे लागू नहीं कराए जा सकते, पर उनकी व्याख्यात्मक भूमिका बड़ी है। State of Madras v. Champakam Dorairajan (1951) जैसे मामलों में आरंभ में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि टकराव होने पर मूल अधिकारों का पलड़ा नीति-निर्देशक तत्वों पर भारी पड़ता है। बाद में Kesavananda Bharati (1973) और Minerva Mills (1980) में न्यायालय ने अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया, यह कहते हुए कि मूल अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से साथ पढ़ा जाना चाहिए, और नीति-निर्देशक तत्व मूल अधिकारों तथा जनहित संबंधी कानूनों के दायरे की व्याख्या में सहायक होते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि नीति-निर्देशक तत्व केवल खोखले वादे हैं जिनका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होता।

    तथ्य: न्यायालयों ने नीति-निर्देशक तत्वों का सहारा लेकर मूल अधिकारों के अर्थ की व्याख्या और विस्तार किया है, जिससे भले वे सीधे लागू न होते हों, पर उनका वास्तविक विधिक प्रभाव पड़ता है।

  • मिथक: यदि नीति-निर्देशक तत्वों का मूल अधिकारों से टकराव हो, तो हर बार नीति-निर्देशक तत्व हारते हैं—यह धारणा सही नहीं है।

    तथ्य: न्यायालयों ने, विशेषकर Kesavananda Bharati और Minerva Mills के बाद, माना है कि संविधान के दोनों हिस्सों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए, न कि हर मामले में एक को दूसरे पर सर्वोपरि मानकर।