The Constitution of India
अनुच्छेद 38
राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा
राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा— 1(1)] राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा । 2(2) राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा ।]
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अनुच्छेद 38 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसे संविधान-निर्माताओं ने इसीलिए जोड़ा कि भारत केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र न होकर सामाजिक और आर्थिक रूप से भी न्यायपूर्ण बने। स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों और वैश्विक कल्याण-राज्य (welfare state) की सोच से प्रेरित होकर यह राज्य को निर्देश देता है कि वह असमानता घटाने के लिए सक्रिय कदम उठाए, न कि लोगों का भाग्य अनियंत्रित बाज़ार-बलों या सामाजिक पदानुक्रम पर छोड़ दे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने अनुच्छेद 38 को अन्य संवैधानिक प्रावधानों, विशेषकर अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत माना है। Minerva Mills v. Union of India जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों, जिनमें अनुच्छेद 38 भी शामिल है, के बीच सामंजस्य पर बल दिया, ताकि आर्थिक न्याय उन्मुख कानूनों को समर्थन मिल सके। भूमि सुधार, न्यूनतम वेतन और सामाजिक कल्याण संबंधी विधान वाले मामलों में भी असमानता घटाने हेतु राज्य के हस्तक्षेप को उचित ठहराने के लिए इस अनुच्छेद का हवाला दिया गया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 38 नागरिकों को यह अधिकार देता है कि वे सीधे सरकार पर मुकदमा कर सबके लिए समान आय की मांग करें।
तथ्य: अनुच्छेद 38 जैसे नीति-निदेशक तत्व अपने आप में अदालत में प्रवर्तनीय नहीं होते; वे सरकारी नीतियों का मार्गदर्शन करते हैं और अदालतों को अन्य क़ानूनों व प्रावधानों की व्याख्या में सहायक होते हैं, पर नागरिक केवल अनुच्छेद 38 के आधार पर सीधे मुकदमा नहीं कर सकते।
मिथक: अनुच्छेद 38 केवल व्यक्तिगत असमानता की ही बात करता है।
तथ्य: यह अनुच्छेद विशेष रूप से अलग-अलग क्षेत्रों या व्यवसायों में लगे समूहों के बीच की असमानताओं को भी संबोधित करता है, केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं है।