The Constitution of India
अनुच्छेद 369
राज्य सूची के कुछ विषयों के संबंध में विधि बनाने की संसद् की इस प्रकार अस्थायी शक्ति मानो वे समवर्ती सूची के विषय हों
राज्य सूची के कुछ विषयों के संबंध में विधि बनाने की संसद् की इस प्रकार अस्थायी शक्ति मानो वे समवर्ती सूची के विषय हों— इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद् को इस संविधान के प्रारंभ से पांच वर्ष की अवधि के दौरान निम्नलिखित विषयों के बारे में विधि बनाने की इस प्रकार शक्ति होगी मानो वे विषय समवर्ती सूची में प्रगणित हों, अर्थात्:- (क) सूती और ऊनी वस्त्रों, कच्ची कपास (जिसके अंतर्गत ओटी हुई रुई और बिना ओटी रुई या कपास है), बिनौले, कागज (जिसके अंतर्गत अखबारी कागज है), खाद्य पदार्थ (जिसके अंतर्गत खाद्य तिलहन और तेल हैं), पशुओं के चारे (जिसके अंतर्गत खली और अन्य सारकृत चारे हैं), कोयले (जिसके अंतर्गत कोक और कोयले के व्युत्पाद हैं), लोहे, इस्पात और अभ्रक का किसी राज्य के भीतर व्यापार और वाणिज्य तथा उनका उत्पादन, प्रदाय और वितरण; (ख) खंड (क) में वर्णित विषयों में से किसी विषय से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराध, उन विषयों में से किसी के संबंध में उच्चतम न्यायालय से भिन्न सभी न्यायालयों की अधिकारिता और शक्तियां, तथा उन विषयों में से किसी के संबंध में फीस किंतु इसके अंतर्गत किसी न्यायालय में ली जाने वाली फीस नहीं है, किंतु संसद् द्वारा बनाई गई कोई विधि, जिसे संसद् इस अनुच्छेद के उपबंधों के अभाव में बनाने के लिए सक्षम नहीं होती, उक्त अवधि की समाप्ति पर अक्षमता की मात्रा तक उन बातों के सिवाय प्रभावी नहीं रहेगी जिन्हें उस अवधि की समाप्ति के पहले किया गया है या करने का लोप किया गया है ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
1950 में भारत को विभाजन, युद्धकालीन व्यवधानों और कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण खाद्यान्न, वस्त्र, कोयला और इस्पात जैसी आवश्यक वस्तुओं की गंभीर कमी का सामना था। ‘राज्य के भीतर’ होने वाला व्यापार सामान्यतः राज्य सूची का विषय था, यानी हर राज्य उसे अलग‑अलग तरीके से विनियमित कर सकता था। इस नाज़ुक संक्रमण काल में पूरे देश में महत्वपूर्ण वस्तुओं के उत्पादन, मूल्य निर्धारण और वितरण का समन्वय केंद्र सरकार कर सके, इसके लिए संविधान सभा ने अनुच्छेद 369 को अस्थायी, पाँच वर्ष के अपवाद के रूप में जोड़ा—जिससे संसद इन राज्य विषयों को पाँच साल के लिए साझा (समवर्ती सूची [Concurrent List]) विषयों जैसा मानकर कानून बना सके।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अनुच्छेद 369 एक अल्पकालिक, संक्रमणकालीन प्रावधान था जो 26 जनवरी 1955 को समाप्त हो गया और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में इस पर विशेष व्याख्या लगभग नहीं बनी, क्योंकि इसका सक्रिय काल दशकों पहले ही खत्म हो गया था। न्यायालयों ने संघ‑राज्य विधायी शक्तियों की ऐतिहासिक रूपरेखा पर चर्चा करते समय कभी‑कभार इसका उल्लेख किया है, पर इसकी धाराओं की व्याख्या पर आधारित कोई ऐतिहासिक निर्णय नहीं है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 369 आज भी संसद को विशेष शक्तियाँ देता है।
तथ्य: यह शक्ति सख्ती से अस्थायी थी और संविधान लागू होने के पाँच वर्ष बाद, 26 जनवरी 1955 को समाप्त हो गई; तब से इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।
मिथक: अनुच्छेद 369 ने इन विषयों को स्थायी रूप से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया।
तथ्य: इसने केवल पाँच वर्षों के लिए संसद को इन्हें ‘मानो’ समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों की तरह मानने दिया—वास्तविक संवैधानिक सूचियों में कभी संशोधन नहीं किया गया।