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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 329

निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन

निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन-1इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी 2***—] (क) अनुच्छेद 327 या अनुच्छेद 328 के अधीन बनाई गई या बनाई जाने के लिए तात्पर्यित किसी ऐसी विधि की विधिमान्यता, जो निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन या ऐसे निर्वाचन-क्षेत्रों को स्थानों के आबंटन से संबंधित है, किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जाएगी; (ख) संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए कोई निर्वाचन ऐसी निर्वाचन अर्जी पर ही प्रश्नगत किया जाएगा, जो ऐसे प्राधिकारी को और ऐसी रीति से प्रस्तुत की गई है जिसका समुचित विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंध किया जाए, अन्यथा नहीं ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत के संविधान-निर्माताओं ने चाहा कि चुनाव निश्चित समय-सारणी पर बिना अदालतों में बीच-बीच में दाखिल मुकदमों से रुके या पटरी से उतरे, पूरे हों। स्वतंत्रता से पहले और संविधान-निर्माण के दौरान यह आशंका थी कि यदि कोई भी मतदाता या प्रत्याशी नामांकन, मतदान या मतगणना—किसी भी चरण में—अदालत चला जाए, तो वाद-विवाद के जरिए चुनाव अनिश्चितकाल तक टल सकते हैं। इसलिए संविधान ने एक विशेष, आत्म-नियंत्रित व्यवस्था बनाई: चुनावी विवाद मतदान के बाद, एक समर्पित चुनाव याचिका प्रक्रिया से निपटाए जाएंगे, जिससे निर्वाचन तंत्र स्वतंत्र और समयबद्ध बना रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

उच्चतम न्यायालय का प्रारम्भिक और सर्वाधिक प्रभावशाली निर्णय N.P. Ponnuswami v. Returning Officer (1952) था, जिसमें माना गया कि अनुच्छेद 329(b) में ‘चुनाव’ (election) शब्द पूरे क्रम को समेटता है—चुनाव की अधिसूचना जारी होने से लेकर परिणाम घोषित होने तक—सिर्फ मतदान दिवस तक सीमित नहीं। इसलिए किसी मध्यवर्ती चरण (जैसे नामांकन अस्वीकार) में रिट याचिकाओं से अदालत का हस्तक्षेप नहीं हो सकता; एकमात्र उपाय प्रक्रिया पूरी होने के बाद दायर चुनाव याचिका है। बाद में Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner (1978) में न्यायालय ने इस निषेध को पुनः पुष्ट किया और परिश्कृत भी किया, साथ ही यह स्पष्ट किया कि कुछ सीमित स्थितियों में (जैसे निर्वाचन आयोग की सामान्य शक्तियों को, जो चुनाव-प्रक्रिया से बाहर हों, चुनौती देना) साधारण न्यायिक समीक्षा संभव हो सकती है। मिलकर, इन निर्णयों ने अनुच्छेद 329 को चुनाव-प्रक्रिया को बीच में होने वाले वादों से बचाने वाली, संकीर्ण किन्तु सशक्त ढाल के रूप में बनाए रखा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अदालतें कभी भी चुनाव से जुड़ी किसी बात की जाँच नहीं कर सकतीं।

    तथ्य: अदालतें चुनावों की समीक्षा कर सकती हैं—परन्तु बाद में, चुनाव याचिका के माध्यम से; प्रक्रिया चल रही हो तब बीच में दखल देकर नहीं।

  • मिथक: यह अनुच्छेद सरकार को बिना किसी नियंत्रण के चुनाव में धांधली करने देता है।

    तथ्य: यह जवाबदेही हटाता नहीं; यह केवल चुनाव-सम्बंधी विवादों को एक निर्धारित विधिक प्रक्रिया—चुनाव याचिका—में भेजता है, बजाय इसके कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय साधारण मुकदमे दायर करता फिरे।