The Constitution of India
अनुच्छेद 328
किसी राज्य के विधान-मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की उस विधान-मंडल की शक्ति
किसी राज्य के विधान-मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की उस विधान-मंडल की शक्ति — इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए और जहां तक संसद् इस निमित्त उपबंध नहीं करती है वहां तक, किसी राज्य का विधान-मंडल समय-समय पर, विधि द्वारा, उस राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में, जिनके अंतर्गत निर्वाचक-नामावली तैयार कराना और ऐसे सदन या सदनों का सम्यक् गठन सुनिश्चित करने के लिए अन्य सभी आवश्यक विषय हैं, उपबंध कर सकेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत का संविधान चुनाव संचालित करने के लिए एक साझा ढांचा स्थापित करता है: संसद पूरे देश के लिए व्यापक चुनावी कानून बना सकती है (अनुच्छेद 327 के तहत), जबकि राज्यों को अनुच्छेद 328 के अंतर्गत अपनी विधायिकाओं के चुनाव से जुड़े विषयों पर कानून बनाने की पूरक/अतिरिक्त (supplementary) शक्ति दी गई है, पर केवल वहाँ तक जहाँ संसद ने रिक्त स्थान छोड़ा है। इससे जहाँ आवश्यक हो वहाँ एकरूपता सुनिश्चित होती है (जैसे निर्वाचन आयोग का उपयोग और समान मतदाता सूची के सिद्धांत), और साथ ही राज्यों को राज्य-विशेष चुनाव प्रबंधन में कुछ लचीलापन भी मिलता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने सामान्यतः अनुच्छेद 328 को संसद की अनुच्छेद 327 के अंतर्गत शक्ति के अधीन माना है। एक बार संसद किसी विषय पर कानून बना दे (जैसे Representation of the People Act, 1950 और 1951 के माध्यम से), तो उसी विषय पर राज्य के कानून टकराव की सीमा तक निष्प्रभावी हो जाते हैं। न्यायिक निर्णयों ने यह पुष्ट किया है कि यह अनुच्छेद राज्यों को स्वतंत्र या श्रेष्ठ नहीं, बल्कि अवशिष्ट, रिक्त-पूर्ति करने वाली शक्ति देता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि राज्यों के पास अपनी विधानसभा चुनावों के संचालन पर पूर्ण और स्वतंत्र नियंत्रण है।
तथ्य: उनकी शक्ति सीमित है — संसद के चुनावी कानूनों को प्रधानता प्राप्त है, और राज्य केवल वहीं कानून बना सकते हैं जहाँ संसद ने रिक्ति छोड़ी हो।