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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 260

भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता

भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता — भारत सरकार किसी ऐसे राज्यक्षेत्र की सरकार से, जो भारत के राज्यक्षेत्र का भाग नहीं है, करार करके ऐसे राज्यक्षेत्र की सरकार में निहित किन्हीं कार्यपालक, विधायी या न्यायिक कृत्यों का भार अपने ऊपर ले सकेगी, किन्तु प्रत्येक ऐसा करार विदेशी अधिकारिता के प्रयोग से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन होगा और उससे शासित होगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया था ताकि भारत को संवैधानिक आधार मिल सके उन विदेशी क्षेत्रों का प्रशासन करने या उनकी सहायता करने का, जहाँ भारत की ऐतिहासिक, संधि-आधारित या संक्रमणकालीन जिम्मेदारियाँ रही हों—जैसे छोटे एन्क्लेव, संरक्षित राज्य या राजनीतिक संक्रमण से गुजरते क्षेत्र। अनौपचारिक रूप से काम करने के बजाय भारत औपचारिक समझौते कर सकता है, परन्तु ये ‘Foreign Jurisdiction Act’ और इसी प्रकार के कानूनों से बँधे रहते हैं, जिससे संसद की निगरानी और कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित होती है और विदेश में कार्यपालिका की अबाधित कार्रवाई की गुंजाइश नहीं रहती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 260 भारत को विदेशी क्षेत्रों पर अधिकार कर लेने या उन्हें मिला लेने (विलय/संलग्नीकरण) की अनुमति देता है।

    तथ्य: यह प्रावधान केवल समझौते द्वारा कुछ विशिष्ट कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका संबंधी कार्य सम्पन्न करने देता है—यह उस क्षेत्र की संप्रभुता या स्वामित्व भारत को हस्तांतरित नहीं करता।

  • मिथक: भारत इस शक्ति का उपयोग मनमाने ढंग से, बिना किसी प्रतिबंध के कर सकता है।

    तथ्य: अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि ऐसे समझौते विदेशी अधिकार-क्षेत्र से संबंधित विद्यमान कानूनों के अनुसार ही होंगे, अर्थात् यह शक्ति जिस प्रकार प्रयुक्त होगी, वह संसद द्वारा बनाए गए विधिक ढाँचे से शासित रहेगी।