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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 261

सार्वजनिक कार्य, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियां

सार्वजनिक कार्य, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियां — (1) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र, संघ के और प्रत्येक राज्य के सार्वजनिक कार्यों, अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को पूरा विश्वास और पूरी मान्यता दी जाएगी । (2) खंड (1) में निर्दिष्ट कार्यों, अभिलेखों और कार्यवाहियों को साबित करने की रीति और शर्तें तथा उनके प्रभाव का अवधारण संसद् द्वारा बनाई गई विधि द्वारा उपबंधित रीति के अनुसार किया जाएगा । (3) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में सिविल न्यायालयों द्वारा दिए गए अंतिम निर्णयों या आदेशों का उस राज्यक्षेत्र के भीतर कहीं भी विधि के अनुसार निष्पादन किया जा सकेगा । जल संबंधी विवाद

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत का संविधान एक देश में अनेक राज्यों की व्यवस्था करता है, जहाँ प्रत्येक के अपने न्यायालय और प्रशासनिक अभिलेख हैं। ऐसी व्यवस्था के बिना, एक राज्य का न्यायादेश या आधिकारिक दस्तावेज़ दूसरे राज्य में नज़रअंदाज़ या संदिग्ध माना जा सकता था, जिससे उन नागरिकों के लिए अव्यवस्था होती जो राज्यों के पार स्थानांतरित होते हैं, व्यापार करते हैं, या न्याय चाहते हैं। अनुच्छेद 261 संघीय संविधान प्रणालियों (जैसे United States) में मिलने वाले ‘पूर्ण विश्वास और श्रेय’ की अवधारणा से प्रेरित है, ताकि विधिक एकरूपता बनी रहे: जो एक राज्य में वैध है, वह पूरे संघ में वैध माना जाए, और न्यायालय के निर्णयों को हर बार सीमा पार होने पर दोबारा मुक़दमे या दोबारा प्रमाण की ज़रूरत न पड़े।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः अनुच्छेद 261 को संविधान द्वारा परिकल्पित एकीकृत न्यायिक तंत्र के संबल के रूप में पढ़ा है, जहाँ भारत में न्यायालयों की एक ही श्रेणीबद्ध व्यवस्था है (संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह अलग-अलग राज्य और संघीय तंत्र नहीं)। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि ‘पूर्ण विश्वास और श्रेय’ का अर्थ यह नहीं कि धोखे (कपट) से या अधिकार-क्षेत्र के बिना प्राप्त निर्णय को आँख मूँदकर प्रवर्तित कर दिया जाए — प्राकृतिक न्याय और अधिकार-क्षेत्र के सिद्धांत लागू रहते हैं। उपबंध (3) को दीवानी प्रक्रिया संहिता के साथ पढ़ा गया है, जो यह बताती है कि डिक्री को राज्यों के पार कैसे स्थानांतरित और निष्पादित किया जाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 261 का अर्थ यह है कि हर निर्णय बिना किसी सवाल के स्वतः ही हर जगह प्रवर्तित होगा।

    तथ्य: न्यायालय अब भी अधिकार-क्षेत्र और बुनियादी निष्पक्षता की जाँच करते हैं; धोखे से प्राप्त या समुचित अधिकार-क्षेत्र के बिना दिया गया निर्णय अंधी मान्यता का हक़दार नहीं है।

  • मिथक: यह अनुच्छेद केवल न्यायालय के निर्णयों पर ही लागू होता है।

    तथ्य: यह ‘सार्वजनिक कृत्यों’ और ‘अभिलेखों’ पर भी लागू होता है — अर्थात् संघ और राज्यों के कानून, आधिकारिक दस्तावेज़ और प्रशासनिक अभिलेख; केवल न्यायिक निर्णय ही नहीं।