Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 225

विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता

विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता— इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए और इस संविधान द्वारा समुचित विधान-मंडल को प्रदत्त शक्तियों के आधार पर उस विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी विद्यमान उच्च न्यायालय की अधिकारिता और उसमें प्रशासित विधि तथा उस न्यायालय में न्याय प्रशासन के संबंध में उसके न्यायाधीशों की अपनी-अपनी शक्तियां, जिनके अंतर्गत न्यायालय के नियम बनाने की शक्ति तथा उस न्यायालय और उसके सदस्यों की बैठकों का चाहे वे अकेले बैठें या खंड न्यायालयों में बैठें विनियमन करने की शक्ति है, वही होंगी जो इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले थीं: 1परंतु राजस्व संबंधी अथवा उसका संग्रहण करने में आदिष्ट या किए गए किसी कार्य संबंधी विषय की बाबत उच्च न्यायालयों में से किसी की आरंभिक अधिकारिता का प्रयोग, इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले, जिस किसी निबंधन के अधीन था वह निबंधन ऐसी अधिकारिता के प्रयोग को ऐसे प्रारंभ के पश्चात् लागू नहीं होगा ।]

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत के उच्च न्यायालय संविधान से बहुत पहले से मौजूद थे, जिन्हें ब्रिटिश काल के साधनों जैसे लेटर्स पेटेंट और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट्स द्वारा स्थापित किया गया था, और प्रत्येक का अधिकार-क्षेत्र व प्रक्रिया अपने-अपने ढंग की थी। संविधान-निर्माताओं ने हर न्यायालय की शक्तियाँ नए सिरे से लिखने के बजाय निरंतरता का रास्ता चुना: जो विद्यमान था उसे बनाए रखना, भविष्य में संवैधानिक या विधायी परिवर्तन के अधीन। किंतु एक औपनिवेशिक अवशेष — राजस्व वसूली संबंधी विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक, जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद के ब्रिटिश प्रशासन ने कर-वसूली को निर्बाध रखने हेतु संरक्षित किया था — लोकशाही गणराज्य में नागरिकों के न्यायिक समीक्षा के अधिकार के प्रतिकूल माना गया, इसलिए उपबंध ने उसे विशेष रूप से समाप्त कर दिया।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

Shah Babulal Khimji v. Jayaben D. Kania (1981) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 225 पर भरोसा करते हुए ठहराया कि लेटर्स पेटेंट अपीलें (एकल न्यायाधीश से खंडपीठ तक वही उच्च न्यायालय के भीतर अपील), जो कुछ उच्च न्यायालयों की 1950-पूर्व विशेषता थी, संविधान के बाद भी जीवित रहती हैं क्योंकि अनुच्छेद 225 ऐसी पूर्व-विद्यमान शक्तियों को तब तक जारी रखता है जब तक उन्हें वैध क़ानून द्वारा बदला न जाए। न्यायालयों ने इसी अनुच्छेद का सहारा लेकर अंतर्निहित शक्तियों, पुनर्विचार-अधिकार-क्षेत्र और मूल पक्ष (original side) की प्रक्रियाओं जैसी 1950-पूर्व व्यवस्थाओं के बने रहने को भी समझाया है, भले ही उन्हें बाद में अलग से दोबारा अधिनियमित न किया गया हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 225 उच्च न्यायालयों को एकदम नई शक्तियाँ देता है।

    तथ्य: इसका उलटा है — यह सिर्फ़ उतनी शक्तियाँ, अधिकार-क्षेत्र और कार्यविधियाँ जारी रखता है जो प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास संविधान से पहले थीं, और जिन्हें वैध क़ानून के जरिए बदला जा सकता है।

  • मिथक: इस अनुच्छेद के कारण उच्च न्यायालयों को राजस्व मामलों की सुनवाई से कभी रोका ही नहीं जा सकता।

    तथ्य: यह अनुच्छेद केवल राजस्व मामलों में मूल अधिकार-क्षेत्र पर लगी 1950-पूर्व विशेष पाबंदी को हटाता है; संसद या राज्य विधानसभाएँ फिर भी नए क़ानूनों के जरिए ऐसे अधिकार-क्षेत्र का वैध रूप से विनियमन कर सकती हैं।