Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 224A

उच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति

उच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति— इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, 4राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग किसी राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से,] किसी व्यक्ति से, जो उस उच्च न्यायालय या किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का पद धारण कर चुका है, उस राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध कर सकेगा और प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जिससे इस प्रकार अनुरोध किया जाता है, इस प्रकार बैठने और कार्य करने के दौरान ऐसे भत्तों का हकदार होगा जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे और उसको उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सभी अधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार होंगे, किंतु उसे अन्यथा उस उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं समझा जाएगा: परंतु जब तक यथापूर्वोक्त व्यक्ति उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने की सहमति नहीं दे देता है तब तक इस अनुच्छेद की कोई बात उससे ऐसा करने की अपेक्षा करने वाली नहीं समझी जाएगी ।]

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत के उच्च न्यायालयों में अक्सर लंबित मामलों का भारी बोझ और कार्यরত न्यायाधीशों की कमी रहती है। अनुच्छेद 224A अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अस्थायी तौर पर पीठ में शामिल करने का एक लचीला, त्वरित तरीका देता है, जिससे नए न्यायिक नियुक्तियों की लंबी प्रक्रिया से गुजरे बिना सहायता मिलती है, और दुरुपयोग रोकने हेतु नियंत्रण (राष्ट्रपति की सहमति, न्यायाधीश की स्वयं की सहमति) बनाए रखे जाते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

दशकों तक यह प्रावधान शायद ही उपयोग हुआ। 2021 में, Lok Prahari v. Union of India में, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में मामलों की विशाल लंबित संख्या को रेखांकित किया और निर्देश दिया कि अनुच्छेद 224A को सक्रिय रूप से लागू किया जाए। उसने एक संरचित प्रक्रिया तय की — जिसमें प्रत्येक उच्च न्यायालय में कितने तदर्थ (ad hoc) न्यायाधीश हो सकते हैं (अनुमोदित शक्ति के लगभग 20% तक), उनका चयन कैसे हो, और यह कि वे मुख्यतः दीर्घकाल से लंबित मामलों को निबटाएँ — ताकि यह प्रावधान निष्क्रिय न रहकर व्यावहारिक रूप से प्रभावी बने।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि अनुच्छेद 224A के तहत सेवानिवृत्त न्यायाधीश को काम पर लौटने का आदेश दिया जा सकता है।

    तथ्य: अनुच्छेद का उपबंध (proviso) स्पष्ट करता है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश की सहमति अनिवार्य है; उन्हें फिर से सेवा करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

  • मिथक: अनुच्छेद 224A के तहत नियुक्त न्यायाधीश फिर से पूर्ण उच्च न्यायालय न्यायाधीश बन जाता है — यह कथन गलत है।

    तथ्य: जब न्यायाधीश इस रूप में बैठता है तो उसके पास वही अधिकार-क्षेत्र और शक्तियाँ होती हैं, पर उसे अन्यथा नियमित उच्च न्यायालय न्यायाधीश नहीं माना जाता — उदाहरण के लिए, इससे स्थायी कार्यकाल या वरिष्ठता बहाल नहीं होती।