The Constitution of India
अनुच्छेद 220
स्थायी न्यायाधीश रहने के पश्चात् विधि-व्यवसाय पर निबंधन
स्थायी न्यायाधीश रहने के पश्चात् विधि-व्यवसाय पर निबंधन— कोई व्यक्ति, जिसने इस संविधान के प्रारंभ के पश्चात् किसी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, उच्चतम न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के सिवाय भारत में किसी न्यायालय या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा । स्पष्टीकरण—इस अनुच्छेद में, “उच्च न्यायालय” पद के अंतर्गत संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ634 से पहले विद्यमान पहली अनुसूची के भाग ख में विनिर्दिष्ट राज्य का उच्च न्यायालय नहीं है ।]
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
इस अनुच्छेद का उद्देश्य न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है। यह सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को निचली अदालतों या अधिकरणों के समक्ष वकालत करते समय अपने पूर्व पद, प्रभाव, या न्यायालय‑तंत्र की अंदरूनी जानकारी का अनुचित लाभ उठाने से रोकता है। पूर्व न्यायाधीश कहाँ वकालत कर सकते हैं, इस पर प्रतिबंध लगाकर संविधान जनता के भरोसे को बनाए रखना चाहता है और किसी भी प्रकार की अनुचितता के आभास से बचना चाहता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय का न्यायाधीश फिर कभी कहीं भी वकालत नहीं कर सकता—यह कथन गलत है।
तथ्य: वे अभी भी सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों (जिस उच्च न्यायालय में उन्होंने सेवा की, उसे छोड़कर) के समक्ष वकालत कर सकते हैं—यह प्रतिबंध वकालत पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
मिथक: यह नियम सभी न्यायाधीशों पर लागू होता है, जिनमें अस्थायी या अतिरिक्त न्यायाधीश भी शामिल हैं—यह कथन सही नहीं है।
तथ्य: अनुच्छेद 220 विशेष रूप से उन पर लागू होता है जिन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया, और न्यायालयों ने इसके भाषा‑पाठ को अनुच्छेद 217 जैसे संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में सावधानी से पढ़ा है।