The Constitution of India
अनुच्छेद 219
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान—2*** उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पदग्रहण करने से पहले, उस राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
निर्माताओं का उद्देश्य था कि हर न्यायाधीश पद ग्रहण करने से पहले सार्वजनिक रूप से यह वचन दे कि वह संविधान की रक्षा करेगा और निडर होकर, पक्षपात रहित होकर कर्तव्यों का निर्वहन करेगा। राज्यपाल (राज्य के संवैधानिक प्रमुख) के समक्ष यह अनिवार्यता इस कृत्य को औपचारिक और सांकेतिक महत्व देती है तथा न्यायिक अधिकार के विधिक आरंभ को चिह्नित करती है—जैसा कि राष्ट्रपति, राज्यपालों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए भी शपथ संबंधी समान आवश्यकताएँ हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: केवल नियुक्ति-पत्र से ही कोई व्यक्ति तुरंत न्यायाधीश बन जाता है और तत्काल मामलों का निर्णय कर सकता है—यह कथन गलत है।
तथ्य: अनुच्छेद 219 के अनुसार वर्णित शपथ लिए बिना और उस पर हस्ताक्षर किए बिना, वह व्यक्ति न तो पद ग्रहण कर सकता है और न ही न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।
मिथक: यह शपथ कोई भी अधिकारी नहीं दिला सकता।
तथ्य: शपथ राज्य के राज्यपाल के समक्ष, या उस उद्देश्य के लिए विशेष रूप से राज्यपाल द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष ही ली जानी चाहिए।