The Constitution of India
अनुच्छेद 218
उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ उपबंधों का उच्च न्यायालयों को लागू होना
उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ उपबंधों का उच्च न्यायालयों को लागू होना— अनुच्छेद 124 के खंड (4) और खंड (5) के उपबंध, जहां-जहां उनमें उच्चतम न्यायालय के प्रति निर्देश है वहां-वहां उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश प्रतिस्थापित करके, उच्च न्यायालय के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उच्चतम न्यायालय के संबंध में लागू होते हैं ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान-निर्माताओं ने चाहा कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय—दोनों के न्यायाधीश मनमानी तरीके से हटाए जाने से समान रूप से दृढ़ संरक्षण पाएं, ताकि पूरे देश में न्यायिक स्वतंत्रता एकरूप बनी रहे। उच्च न्यायालयों के लिए हटाने की प्रक्रिया अलग से दोहराने के बजाय, विधिवेत्ताओं ने अनुच्छेद 124 के प्रावधानों को संदर्भ द्वारा अनुच्छेद 218 के माध्यम से बढ़ा दिया, जिससे समानता बनी रहे और अनावश्यक पुनरावृत्ति न हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः अनुच्छेद 218 को एक सरल ‘समावेशन’ उपबंध की तरह पढ़ा है, जो वही प्रक्रियात्मक सुरक्षा और वही ‘सिद्ध दुर्व्यवहार या असमर्थता’ का मानक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक विस्तारित करता है। ‘जजेज़ केसेज़’ (विशेषकर द्वितीय और तृतीय ‘जजेज़ केसेज़’ में हुई चर्चाएँ) ने पुनः पुष्टि की कि न्यायिक स्वतंत्रता के संरक्षण—जिसमें हटाने से संबंधित सुरक्षा भी शामिल है—उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के बीच सुसंगत रूप से पढ़े जाने चाहिए, जिससे अनुच्छेद 218 के परस्पर-संदर्भ का उद्देश्य पुष्ट होता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की तुलना में आसान है, क्योंकि उच्च न्यायालय ‘निम्न’ है। ऐसा नहीं है।
तथ्य: अनुच्छेद 218 सुनिश्चित करता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की वही कड़ी सुरक्षा—दुर्व्यवहार/असमर्थता का सिद्ध होना, संसदीय जाँच, और दोनों सदनों में विशेष बहुमत का मत—उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के समान ही मिले; कोई आसान प्रक्रिया नहीं है।