The Constitution of India
अनुच्छेद 198
धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया
धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया— (1) धन विधेयक विधान परिषद् में पुरःस्थापित नहीं किया जाएगा । (2) धन विधेयक विधान परिषद् वाले राज्य की विधान सभा द्वारा पारित किए जाने के पश्चात् विधान परिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए पारेषित किया जाएगा और विधान परिषद् विधेयक की प्राप्ति की तारीख से चौदह दिन की अवधि के भीतर विधेयक को अपनी सिफारिशों सहित विधान सभा को लौटा देगी और ऐसा होने पर विधान सभा, विधान परिषद् की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकेगी । (3) यदि विधान सभा, विधान परिषद् की किसी सिफारिश को स्वीकार कर लेती है तो धन विधेयक विधान परिषद् द्वारा सिफारिश किए गए और विधान सभा द्वारा स्वीकार किए गए संशोधनों सहित दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया समझा जाएगा । (4) यदि विधान सभा, विधान परिषद् की किसी भी सिफारिश को स्वीकार नहीं करती है तो धन विधेयक विधान परिषद् द्वारा सिफारिश किए गए किसी संशोधन के बिना, दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधान सभा द्वारा पारित किया गया था । (5) यदि विधान सभा द्वारा पारित और विधान परिषद् को उसकी सिफारिशों के लिए पारेषित धन विधेयक उक्त चौदह दिन की अवधि के भीतर विधान सभा को नहीं लौटाया जाता है तो उक्त अवधि की समाप्ति पर वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें वह विधान सभा द्वारा पारित किया गया था ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल है, जिसमें प्रत्यक्ष निर्वाचित विधायी सभा और परोक्ष रूप से निर्वाचित/नामित विधान परिषद् शामिल हैं। चूँकि सभा जनता के प्रत्यक्ष जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है और राज्य की वित्त-व्यवस्था पर नियंत्रण रखती है, संविधान (संसद के लिए अनुच्छेद 109–110 में बनाए गए संघीय ढाँचे का प्रतिबिम्ब) यह सुनिश्चित करता है कि निर्वाचित न होने वाली या परोक्ष रूप से निर्वाचित परिषद् वित्तीय कानूनों को न तो टाल सके, न रोक सके, न बदल सके। इससे यह सिद्धान्त अक्षुण्ण रहता है कि धन पर नियंत्रण सीधे जवाबदेह सदन के पास हो, जबकि परिषद् को सीमित परामर्शात्मक भूमिका मिलती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: विधान परिषद् धन विधेयक को रोक सकती है या उस पर वीटो लगा सकती है।
तथ्य: परिषद् केवल 14 दिनों के भीतर सुझाव दे सकती है; उसके पास धन विधेयक को अस्वीकार करने या अनिश्चितकाल तक टालने की शक्ति नहीं है।
मिथक: धन विधेयक राज्य की किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
तथ्य: अनुच्छेद 198(1) के अनुसार धन विधेयक केवल विधायी सभा में ही प्रस्तुत किया जाएगा, कभी भी विधान परिषद् में नहीं।