The Constitution of India
अनुच्छेद 195
सदस्यों के वेतन और भत्ते
सदस्यों के वेतन और भत्ते— राज्य की विधान सभा और विधान परिषद् के सदस्य ऐसे वेतन और भत्ते, जिन्हें उस राज्य का विधान-मंडल, समय-समय पर, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस संबंध में इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्ते, ऐसी दरों से और ऐसी शर्तों पर, जो तत्स्थानी प्रांत की विधान सभा के सदस्यों को इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले लागू थीं, प्राप्त करने के हकदार होंगे । विधायी प्रक्रिया
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माताओं का उद्देश्य था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को निश्चित वेतन मिले ताकि वे निजी संपत्ति पर निर्भर हुए बिना जनसेवा कर सकें और व्यापक लोकतांत्रिक भागीदारी संभव हो। साथ ही, क्योंकि हर राज्य को वेतन निर्धारण का अपना विधि बनाने में समय लगेगा, संविधान ने एक बैकअप व्यवस्था दी: पुराने प्रांतीय विधान मंडलों द्वारा दिए जाने वाले वेतन-भत्ते जारी रहें, ताकि राज्य विधानमंडल संगठित होते समय भुगतान में कोई अंतराल न आए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है कि विधायक (MLA) और विधान परिषद सदस्य (MLC) अपनी तनख्वाहें सीधे मनमाने ढंग से स्वयं तय करते हैं।
तथ्य: उनके वेतन और भत्ते अनौपचारिक फैसलों से नहीं, बल्कि राज्य की विधानमंडल द्वारा विधिवत पारित विधि के माध्यम से निर्धारित होने चाहिए।
मिथक: यह कथन गलत है कि बिना किसी विशेष विधि के राज्य विधायकों को कोई वेतन नहीं मिलता।
तथ्य: अनुच्छेद 195 एक बैकअप (फॉलबैक) प्रदान करता है: यदि नई विधि अस्तित्व में न हो, तो भी उन्हें वही वेतन और भत्ते पाने का अधिकार रहता है जो संबंधित संविधान-पूर्व प्रांतीय सभा में लागू दरों पर मिलते थे।