The Constitution of India
अनुच्छेद 177
सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार
सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार— प्रत्येक मंत्री और राज्य के महाधिवक्ता को यह अधिकार होगा कि वह उस राज्य की विधान सभा में या विधान परिषद् वाले राज्य की दशा में दोनों सदनों में बोले और उनकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले और विधान-मंडल की किसी समिति में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में दिया गया है, बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले, किन्तु इस अनुच्छेद के आधार पर वह मत देने का हकदार नहीं होगा । राज्य के विधान-मंडल के अधिकारी
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत की संसदीय व्यवस्था में मंत्री अक्सर एक सदन के सदस्य होते हैं, पर द्विसदनीय राज्यों में उन्हें दूसरे सदन में भी सरकारी नीति समझानी या उसका बचाव करना पड़ सकता है; या कोई मंत्री नियुक्ति के समय अभी किसी भी सदन का सदस्य न हो सकता है (अनुच्छेद 164(4) के अनुसार उसे चुने जाने के लिए अधिकतम छह माह मिलते हैं)। इसी प्रकार महाधिवक्ता, यद्यपि निर्वाचित विधायक नहीं होते, राज्य के प्रमुख विधि अधिकारी होते हैं और वाद-विवाद के दौरान सदन को विधिक विषयों पर परामर्श देना पड़ता है। अनुच्छेद 177 यह सुनिश्चित करता है कि ये महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी बिना पूर्ण सदस्यता के भी विधायी कार्य में सार्थक भागीदारी कर सकें; यह संसद के लिए बने समान प्रावधान, अनुच्छेद 88, का प्रतिबिंब है, और साथ ही यह सिद्धांत सुरक्षित रखता है कि मतदान का अधिकार केवल निर्वाचित/नामित सदस्यों को ही होना चाहिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सिर्फ इसलिए कि अनुच्छेद 177 मंत्री को किसी सदन में बोलने देता है, वह उस राज्य की विधायिका के किसी भी सदन में मत दे सकता/सकती है—यह कथन गलत है।
तथ्य: अनुच्छेद 177 स्पष्ट करता है कि केवल इसी अनुच्छेद के आधार पर उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं है; मतदान का अधिकार उस सदन की वास्तविक सदस्यता पर निर्भर करता है।
मिथक: यह कहना गलत है कि महाधिवक्ता राज्य की विधायिका के सदस्य होते हैं।
तथ्य: महाधिवक्ता न तो निर्वाचित और न ही नामित विधायक होते हैं; अनुच्छेद 177 उन्हें केवल बोलने और भाग लेने का विशेष अधिकार देता है, सदस्यता नहीं।