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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 175

सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार

सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार— (1) राज्यपाल, विधान सभा में या विधान परिषद् वाले राज्य की दशा में उस राज्य के विधान-मंडल के किसी एक सदन में या एक साथ समवेत दोनों सदनों में, अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा । (2) राज्यपाल, राज्य के विधान-मंडल में उस समय लंबित किसी विधेयक के संबंध में संदेश या कोई अन्य संदेश, उस राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों को भेज सकेगा और जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है वह सदन उस संदेश द्वारा विचार करने के लिए अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करेगा ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान संसद के संबंध में अनुच्छेद 87 के अंतर्गत राष्ट्रपति की समान शक्ति का प्रतिबिंब है और भारतीय राज्यों की वेस्टमिंस्टर-प्रेरित संरचना को दर्शाता है, जहाँ राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। इससे राज्यपाल को विधानमंडल से संवाद का एक औपचारिक, गैर-दलीय माध्यम मिलता है—जैसे अधिवेशन का उद्घाटन भाषण देना (अनुच्छेद 176 के तहत) या तात्कालिक विषयों की ओर ध्यान दिलाना—जबकि वास्तविक शासन निर्वाचित मंत्रिमंडल के हाथों में ही रहता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अनुच्छेद 175 पर विशेष रूप से कोई बड़ा न्यायिक विवाद नहीं रहा; न्यायालयों ने सामान्यतः राज्यपाल के संबोधन और संदेश संबंधी अधिकारों को औपचारिक, सांकेतिक कार्य माना है जो मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर किए जाते हैं, और यह व्यापक संवैधानिक ढांचे के अनुरूप है (जैसा कि अनुच्छेद 163 से जुड़े विवादों में राज्यपाल के विवेकाधीन बनाम सलाह-आधारित कार्यों के संदर्भ में स्पष्ट किया गया है)।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: विधानमंडल के समक्ष राज्यपाल का अभिभाषण राज्यपाल के निजी विचारों या नीतिगत पसंद का प्रतिबिंब होता है।

    तथ्य: अभिभाषण राज्य की मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किया जाता है, और राज्यपाल उसे व्यक्तिगत वक्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि औपचारिक, संवैधानिक क्षमता में पढ़ते हैं (सरलीकृत)।

  • मिथक: अनुच्छेद 175(2) के अंतर्गत राज्यपाल का संदेश सदन को किसी विशेष कानून को पारित करने के लिए बाध्य कर सकता है।

    तथ्य: सदन पर केवल विषय पर शीघ्र विचार करने का दायित्व है; वह किसी भी संबंधित प्रस्ताव पर बहस करने, संशोधन करने या उसे अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है।