The Constitution of India
अनुच्छेद 166
राज्य की सरकार के कार्य का संचालन
राज्य की सरकार के कार्य का संचालन— (1) किसी राज्य की सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की हुई कही जाएगी । (2) राज्यपाल के नाम से किए गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा जो राज्यपाल द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है । (3) राज्यपाल, राज्य की सरकार का कार्य अधिक सुविधापूर्वक किए जाने के लिए और जहां तक वह कार्य ऐसा कार्य नहीं है जिसके विषय में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे वहां तक मंत्रियों में उक्त कार्य के आबंटन के लिए नियम बनाएगा । 81(4)*
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह अनुच्छेद ब्रिटिश संवैधानिक परंपरा से प्रेरित है, जहाँ क्राउन औपचारिक रूप से राज्यसत्ता का प्रतिनिधित्व करता है जबकि निर्वाचित मंत्री शासन चलाते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक (नाममात्र) प्रमुख होता है, और वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद में निहित होती है, जो राज्य विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी हैं। अनुच्छेद 166 यह सुनिश्चित करता है कि प्रशासनिक आदेश कानूनी वैधता व निरंतरता के लिए राज्यपाल की औपचारिक प्राधिकृति धारण करें, जबकि शासन का वास्तविक कामकाज नियमों के माध्यम से मंत्रियों में कुशलतापूर्वक बाँटा जा सके, बिना इस आवश्यकता के कि हर निर्णय पर राज्यपाल व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर करें या उसे स्वयं निपटाएँ।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उच्चतम न्यायालय ने विशेष रूप से Shamsher Singh v. State of Punjab (1974) में माना कि राष्ट्रपति की तरह राज्यपाल भी सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता व सलाह पर कार्य करने के बाध्य हैं, और अनुच्छेद 166 के प्रावधान निर्देशात्मक प्रकृति के हैं जो कार्य-संचालन को सुगम बनाने के लिए हैं, न कि राज्यपाल को व्यक्तिगत निर्णयकर्ता बनाने के लिए—सिवाय उन मामलों के जहाँ संविधान विशेष रूप से विवेकाधिकार देता है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि उपधारा (2) के अंतर्गत प्रामाणीकरण नियमों का पालन न होना अपने-आप में सरकारी कार्रवाई को निरस्त नहीं करता, यदि अन्यथा यह प्रदर्शित किया जा सके कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से निर्णय लिया गया था।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है कि राज्यपाल अपने नाम में जारी हर निर्णय व्यक्तिगत रूप से ही लेते हैं।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं; नाम का प्रयोग औपचारिक/कानूनी प्रयोजनों के लिए होता है, न कि इसलिए कि हर विषय पर राज्यपाल ने व्यक्तिगत रूप से निर्णय लिया।
मिथक: यदि कोई आदेश विधिवत प्रामाणीकृत न हो, तो वह अपने-आप अमान्य नहीं हो जाता—यह कथन कि वह स्वतः ही निरस्त है, गलत है।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि तकनीकी प्रामाणीकरण का अभाव आवश्यक रूप से किसी सरकारी निर्णय को निरस्त नहीं करता, यदि यह दर्शाया जा सके कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से निर्णय लिया गया था।