The Constitution of India
अनुच्छेद 165
राज्य का महाधिवक्ता
राज्य का महाधिवक्ता— (1) प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा । (2) महाधिवक्ता का यह कर्तव्य होगा कि वह उस राज्य की सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो राज्यपाल उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किए गए हों । (3) महाधिवक्ता, राज्यपाल के प्रसादपयंत पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे । सरकारी कार्य का संचालन
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह अनुच्छेद राज्य स्तर पर अनुच्छेद 76 (Attorney-General for India) का समतुल्य है, ताकि हर राज्य के पास अपना वरिष्ठ विधिक सलाहकार हो जो सरकार का संवैधानिक और कानूनी मामलों में प्रतिनिधित्व और मार्गदर्शन करे; इसका आधार ब्रिटिश और स्वाधीनता-पूर्व भारत की उस परंपरा में है जिसमें कार्यपालिका के लिए मुख्य क़ानून अधिकारी की नियुक्ति होती थी।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः महाधिवक्ता के पद को साधारण सरकारी सेवा से अलग एक संवैधानिक पद माना है, और यह माना है कि ‘राज्यपाल के प्रसाद’ वाला प्रावधान इस पद को न्यायाधीश जैसा कार्यकाल-सुरक्षा नहीं देता; हालांकि इस पद पर वैसे ऐतिहासिक महत्त्व के निर्णय नहीं हुए हैं जैसे भारत के महान्यायवादी (Attorney-General) पर हुए हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है: महाधिवक्ता न तो न्यायाधीश होता है और न ही उसके पास न्यायिक अधिकार होते हैं।
तथ्य: महाधिवक्ता के लिए केवल इतना आवश्यक है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए ‘पात्र’ हो, पर उसका पद सरकार का विधिक सलाहकार है, कोई न्यायिक पद नहीं।
मिथक: यह कथन गलत है: महाधिवक्ता का कोई निश्चित कार्यकाल न्यायाधीशों जैसा नहीं होता।
तथ्य: अनुच्छेद 165(3) स्पष्ट करता है कि महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसाद पर कार्य करता है, अर्थात् बिना किसी निश्चित कार्यकाल के उसे किसी भी समय पद से हटाया जा सकता है।