The Constitution of India
अनुच्छेद 155
राज्यपाल की नियुक्ति
राज्यपाल की नियुक्ति— राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत ने संसदीय शासन प्रणाली अपनाई, जिसमें राज्यों के अपने प्रमुख (राज्यपाल) होते हैं, जैसे संघ का प्रमुख राष्ट्रपति होता है। विधि-निर्माताओं ने एकसमान व औपचारिक नियुक्ति-पद्धति इसलिए रखी कि यह संकेत मिल सके कि राज्यपाल सीधे संघ के कार्यपालिका से अपना पद प्राप्त करते हैं, जो भारत की प्रबल केंद्रयुक्त अर्ध-संघीय संरचना को दर्शाता है। ‘हस्ताक्षर और मुहर के अधीन वारंट’ वाला वाक्यांश ब्रिटिश संवैधानिक परंपरा से लिया गया है, जो नियुक्ति की औपचारिकता और प्रामाणिकता पर बल देता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि अनुच्छेद 155 के अंतर्गत राष्ट्रपति की शक्ति, अनुच्छेद 74 के अनुसार, केंद्र के मंत्रिपरिषद की सहायता व सलाह पर ही प्रयुक्त होती है, न कि राष्ट्रपति के निजी विवेक से। B.P. Singhal v. Union of India (2010) जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के कार्यकाल व पदच्युत करने से जुड़े प्रश्नों पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि नियुक्ति औपचारिक रूप से राष्ट्रपति द्वारा होती है, परन्तु वस्तुतः यह केंद्र सरकार का निर्णय होता है, और कोई भी पदच्युति मनमानी नहीं हो सकती। स्वयं यह अनुच्छेद स्वतंत्र रूप से व्यापक वाद-विवाद का विषय नहीं रहा; अधिकांश विवाद अनुच्छेद 156 (कार्यकाल) या अनुच्छेद 163 (राज्यपाल का विवेक) के अंतर्गत उठते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत विवेक से, स्वयं के निर्णय पर, राज्यपाल चुनते हैं।
तथ्य: व्यवहार में, भारत की संसदीय प्रणाली के अंतर्गत अधिकांश राष्ट्रपतीय कार्यों की तरह (अनुच्छेद 74), राष्ट्रपति केंद्र की मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं।
मिथक: अनुच्छेद 155 राज्यपालों को संघ से पृथक स्वतंत्र शक्ति प्रदान करता है।
तथ्य: यह अनुच्छेद केवल नियुक्ति की विधि को कवर करता है; राज्यपाल की शक्तियाँ और कार्य अन्यत्र, जैसे अनुच्छेद 163 में, परिभाषित हैं, और यह पद संघ की कार्यपालिका से संबद्ध रहता है।