The Constitution of India
अनुच्छेद 125
न्यायाधीशों के वेतन, आदि
न्यायाधीशों के वेतन, आदि— 1(1) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को ऐसे वेतनों का संदाय किया जाएगा जो संसद्, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतनों का संदाय किया जाएगा जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं ।] (2) प्रत्येक न्यायाधीश ऐसे विशेषाधिकारों और भत्तों का तथा अनुपस्थिति छुट्टी और पेंशन के संबंध में ऐसे अधिकारों का, जो संसद् द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन समय-समय पर अवधारित किए जाएं और जब तक इस प्रकार अवधारित नहीं किए जाते हैं तब तक ऐसे विशेषाधिकारों, भत्तों और अधिकारों का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा: परन्तु किसी न्यायाधीश के विशेषाधिकारों और भत्तों में तथा अनुपस्थिति छुट्ट ी या पेंशन के संबंध में उसके अधिकारों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान न्यायाधीशों की वित्तीय सुरक्षा को राजनीतिक दबाव या तत्कालीन सरकार के मनमाने बदलावों से मुक्त रखकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। वेतन संसद द्वारा कानून से तय कराने (कार्यपालिका की मनमानी के बजाय) और नियुक्ति के बाद हानिकारक बदलावों पर रोक लगाकर, निर्माताओं का उद्देश्य था कि वेतन-संबंधित किसी लालच या धमकी से न्यायाधीश दूर रहें और बिना वित्तीय प्रतिशोध के भय के मामलों का निपटारा कर सकें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने आम तौर पर इस अनुच्छेद को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने वाला माना है, और वित्तीय सुरक्षा को मात्र सेवा-शर्त नहीं बल्कि संरचनात्मक सुरक्षा-उपाय के रूप में देखा है। यद्यपि अकेले अनुच्छेद 125 की व्याख्या पर कोई एकमात्र अग्रणी निर्णय नहीं है, अदालतों ने न्यायपालिका की स्वायत्तता पर चर्चा में इसे अनुच्छेद 50 और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के साथ उद्धृत किया है, और ‘हानिकारक’ परिवर्तनों (निषिद्ध) तथा लाभकारी संशोधनों (अनुमेय) के बीच सावधानी से भेद किया है, जैसे पेंशन में वृद्धि या वेतन संशोधन, जिनका प्रावधान High Court and Supreme Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Acts जैसे अधिनियमों में मिलता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि सरकार जब चाहे पैसों की बचत के लिए न्यायाधीशों का वेतन काट सकती है।
तथ्य: अनुच्छेद 125 का उपबंध (proviso) विशेष रूप से नियुक्ति के बाद न्यायाधीश के विशेषाधिकार, भत्ते, अवकाश-अधिकार या पेंशन में किसी भी कमी को रोकता है, हालांकि बढ़ोतरी की अनुमति है।
मिथक: यह कहना गलत है कि न्यायाधीशों का वेतन पूरी तरह संविधान में सदा-सर्वदा के लिए जड़ कर दिया गया है और वह कभी बदल नहीं सकता।
तथ्य: संविधान केवल प्रारंभिक/डिफ़ॉल्ट वेतन-आंकड़े (द्वितीय अनुसूची) देता है, जब तक कि संसद कानून न बना दे; संसद वेतन और लाभों में संशोधन कर सकती है और करती है, पर कार्यरत न्यायाधीशों के लिए यह संशोधन केवल ऊपर की ओर हो सकता है, नीचे की ओर नहीं।