The Constitution of India
अनुच्छेद 123
संसद् के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति
संसद् के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति— (1) उस समय को छोड़कर जब संसद् के दोनों सदन सत्र में हैं, यदि किसी समय राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण तुरन्त कार्रवाई करना उसके लिए आवश्यक हो गया है तो वह ऐसे अध्यादेश प्रख्यापित कर सकेगा जो उसे उन परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों । (2) इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होगा जो संसद् के अधिनियम का होता है, किन्तु प्रत्येक ऐसा अध्यादेश— (क) संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा और संसद् के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर या यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले दोनों सदन उसके अननुमोदन का संकल्प पारित कर देते हैं तो, इनमें से दूसरे संकल्प के पारित होने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा; और (ख) राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय वापस लिया जा सकेगा । स्पष्टीकरण-जहां संसद् के सदन, भिन्न-भिन्न तारीखों को पुनः समवेत होने के लिए, आहूत किए जाते हैं वहां इस खंड के प्रयोजनों के लिए, छह सप्ताह की अवधि की गणना उन तारीखों में से पश्चातवर्ती तारीख से की जाएगी । (3) यदि और जहां तक इस अनुच्छेद के अधीन अध्यादेश कोई ऐसा उपबंध करता है जिसे अधिनियमित करने के लिए संसद् इस संविधान के अधीन सक्षम नहीं है तो और वहां तक वह अध्यादेश शून्य होगा । 1(4)* * * * अध्याय 4-संघ की न्यायपालिका
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माताओं ने यह विचार Government of India Act, 1935 से लिया। क्योंकि संसद हर समय सत्र में नहीं रह सकती और शासन को कभी-कभी आकस्मिक कानूनी कार्रवाई की जरूरत पड़ती है — जैसे आर्थिक संकट या प्राकृतिक आपदा के समय — इसलिए राष्ट्रपति को (मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हुए) अध्यादेश द्वारा सीमित, अस्थायी विधि-निर्माण की शक्ति दी गई। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह आपात शक्ति स्थायी रूप से लोकतांत्रिक विधि-निर्माण को न दरकिनार करे, सुरक्षा-कवच रखे गए: संसद के समक्ष रखना, स्वतः समाप्ति, और असंवैधानिक उपबन्धों के शून्य होने का प्रावधान।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार जोर देकर कहा है कि अध्यादेश की शक्ति नियमित विधायी स्रोत का समानांतर विकल्प नहीं है, बल्कि वास्तविक आपात उपाय है। R.C. Cooper v. Union of India (1970) में न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति की ‘संतोष’ पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है, यदि दिखाया जाए कि वह असंगत आधारों पर टिकी है। A.K. Roy v. Union of India (1982) तथा बाद में D.C. Wadhwa v. State of Bihar (1987) में, न्यायालय ने बिना विधायिका के समक्ष रखे एक ही अध्यादेश को बार-बार पुनर्प्रख्यापित करने की प्रथा की कड़ी निंदा की, और जब यह विधायिका को दरकिनार करने के लिए किया जाए तो इसे संविधान के साथ छल बताया। इन निर्णयों ने सामूहिक रूप से स्थापित किया कि अध्यादेश-निर्माण की शक्ति विस्तृत होते हुए भी न्यायिक जांच के अधीन है और सतत रूप से वास्तविक संसदीय कानून-निर्माण का स्थान नहीं ले सकती।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अध्यादेश एक बार जारी हो जाए तो वह स्थायी कानून बन जाता है।
तथ्य: यह अस्थायी होता है — संसद के पुनः एकत्र होने के छह सप्ताह बाद यह स्वतः समाप्त हो जाता है, जब तक संसद इसे सामान्य कानून के रूप में पारित न कर दे।
मिथक: राष्ट्रपति किसी भी विषय पर स्वतंत्र रूप से अध्यादेश जारी कर सकते हैं और सदा के लिए संसद को दरकिनार कर सकते हैं।
तथ्य: अदालतों ने माना है कि संसद की स्वीकृति से बचने के लिए बार-बार अध्यादेश जारी करना असंवैधानिक है, और अध्यादेश उस विषय को नहीं ढक सकता जिस पर स्वयं संसद के पास विधि-निर्माण की शक्ति ही नहीं है।
मिथक: राष्ट्रपति की ‘संतोष’ के आधार पर अध्यादेश जारी करने के निर्णय पर कभी भी अदालत में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
तथ्य: R.C. Cooper v. Union of India जैसे न्यायिक निर्णयों ने माना है कि यदि यह दिखे कि वह संतोष अप्रासंगिक या कुटिल (mala fide) आधारों पर टिका है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।