The Constitution of India
अनुच्छेद 106
सदस्यों के वेतन और भत्ते
सदस्यों के वेतन और भत्ते— संसद् के प्रत्येक सदन के सदस्य ऐसे वेतन और भत्ते, जिन्हें संसद्, समय-समय पर, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस संबंध में इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे भत्ते, ऐसी दरों से और ऐसी शर्तों पर, जो भारत डोमिनियन की संविधान सभा के सदस्यों को इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले लागू थीं, प्राप्त करने के हकदार होंगे । विधायी प्रक्रिया
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
जब संविधान का मसौदा तैयार हो रहा था, तब तक सांसदों के वेतन तय करने वाला अलग कानून मौजूद नहीं था। अनुच्छेद 106 ने यह समस्या सुलझाई—संसद को साधारण कानून से अपने सदस्यों के वेतन तय करने का अधिकार देकर, और शुरुआती अवधि के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था (पुरानी संविधान सभा की दरें) जोड़कर ताकि पहले ही दिन कोई खालीपन न रहे। इससे वेतन की निश्चित संख्याएँ स्वयं संविधान में डालने से परहेज़ किया गया, क्योंकि महँगाई और आर्थिक परिस्थितियों के साथ समय-समय पर वेतन स्तर बदलने पड़ते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: गलत: सांसदों के वेतन संविधान द्वारा स्थायी रूप से तय किए गए हैं।
तथ्य: संविधान कोई राशि तय नहीं करता—वह संसद को साधारण कानून, जैसे 1954 के अधिनियम, के माध्यम से वेतन और भत्ते तय करने व बदलने की छूट देता है।
मिथक: यदि संसद ने वेतन-संबंधी कानून बनाने में देर कर दी होती तो सांसदों के बिना भुगतान रहने की नौबत आ सकती थी।
तथ्य: स्वयं अनुच्छेद 106 ने अस्थायी वैकल्पिक व्यवस्था दी: जब तक संसद कानून न बनाए, तब तक संविधान सभा के सदस्यों को मिलने वाले वही भत्ते स्वतः लागू रहेंगे।