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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 75

repealed

Enhanced punishment for certain offences under Chapter XII or Chapter XVII after previous conviction

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

औपनिवेशिक दौर के विधि-निर्माताओं ने संपत्ति-अपराधों और सिक्का/डाक-टिकट जालसाजी में बार-बार अपराध करने वालों को हतोत्साहित करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा। विचार यह था कि जो व्यक्ति किसी गंभीर अपराध में सजा पाने के बाद भी दोबारा अपराध करता है, वह आपराधिक आचरण का पैटर्न दिखाता है और प्रथम-वार अपराधी की तुलना में कड़ी सजा का हकदार है, ताकि संपत्ति-अधिकारों और मुद्रा/डाक-टिकट व्यवस्था में सार्वजनिक विश्वास की रक्षा हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने माना है कि धारा 75 केवल दंड-वृद्धि का प्रावधान है, स्वयं में कोई स्वतंत्र अपराध नहीं; इसे वर्तमान अपराध को परिभाषित करने वाली विशिष्ट धारा (जैसे चोरी या ठगी) के साथ मिलाकर पढ़ना होता है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूर्व दोषसिद्धि को सिद्ध करने के लिए उस निर्णय या उसकी प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करनी होगी, और बढ़ी हुई सजा लागू होने के लिए पूर्ववर्ती तथा वर्तमान—दोनों अपराध अलग-अलग रूप से 3 वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय होने चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 75 एक नया अपराध ‘दोहराया अपराध’ (repeat offence) बनाती है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 75 कोई नया अपराध परिभाषित नहीं करती; यह केवल उस व्यक्ति के लिए बढ़ी हुई सजा की अनुमति देती है जिसे अध्याय XII या XVII के अंतर्गत, पहले भी एक बार दोषसिद्ध होने के बाद, फिर से दोषी ठहराया गया हो।

  • मिथक: कोई भी पिछली दोषसिद्धि, चाहे कितनी भी मामूली हो, इस बढ़ी हुई सजा को स्वतः लागू कर देती है।

    तथ्य: यह प्रावधान तभी लागू होता है जब पूर्ववर्ती और वर्तमान—दोनों अपराध अध्याय XII या XVII के अंतर्गत 3 वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय हों।