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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 69

repealed

Termination of imprisonment on payment of proportional part of fine

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code) के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति जुर्माना अदा करने में विफल रहता है तो न्यायालय ‘डिफ़ॉल्ट कारावास’ (जुर्माना न भरने पर कारावास) दे सकता है, जिसकी अवधि जुर्माने की राशि के अनुपात में तय होती है। धारा 69 निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जोड़ी गई: यदि बाद में व्यक्ति जुर्माने का कुछ भाग या पूरा भुगतान कर दे, तो उसे ऐसे पूरी डिफ़ॉल्ट सज़ा नहीं भुगतनी चाहिए मानो कुछ भी न चुकाया हो। यह प्रावधान उस सिद्धांत को दर्शाता है कि डिफ़ॉल्ट कारावास का उद्देश्य भुगतान के लिए बाध्य करना है, न कि बचे हुए देय की तुलना में असंगत दंड देना।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः इस धारा को एक सरल अंकगणितीय सुरक्षा के रूप में माना है: जैसे ही डिफ़ॉल्ट में काटा गया समय, बकाया राशि के अनुपात में देय अवधि के बराबर या उससे अधिक हो जाए, आगे की हिरासत अवैध हो जाती है। न्यायालय ज़ोर देते हैं कि जैसे ही आंशिक भुगतान हो, जेल अधिकारी और मजिस्ट्रेट शेष अवधि का पुनर्गणन करें, न कि यांत्रिक रूप से मूल सज़ा पूरी कराएँ।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: एक बार डिफ़ॉल्ट कारावास शुरू हो जाने के बाद आंशिक भुगतान का कोई प्रभाव नहीं होता — व्यक्ति को हर हाल में पूरी अवधि काटनी पड़ती है।

    तथ्य: धारा 69 स्पष्ट रूप से यह अपेक्षा करती है कि जैसे ही काटे गए दिन शेष बकाया जुर्माने के अनुपात में बनती अवधि के बराबर हो जाएँ, समय से पहले रिहाई दी जाए; मूल पूरी अवधि पूरी करना आवश्यक नहीं है।

  • मिथक: यह कथन ग़लत है: केवल पूरा जुर्माना भरने से ही डिफ़ॉल्ट कारावास समय से पहले समाप्त हो सकता है।

    तथ्य: क़ानून आंशिक भुगतान के साथ भी रिहाई की अनुमति देता है, बशर्ते गणना दिखाए कि अब तक भुगती गई सज़ा शेष बकाये के अनुपात में देय अवधि के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है।