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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 57

repealed

Fractions of terms of punishment

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता (IPC) और संबंधित क़ानून (जैसे पुराना प्रिज़न्स एक्ट और रिमिशन से जुड़े नियम) अक्सर सजा के भिन्नों का ज़िक्र करते हैं—उदाहरण के लिए, किसी बंदी को अपनी सजा का एक निश्चित हिस्सा काट लेने के बाद किसी लाभ का पात्र माना जाना। पर ‘आजीवन कारावास’ के वर्ष निश्चित नहीं होते, इसलिए उसका भिन्न सीधे नहीं निकाला जा सकता। IPC के ब्रिटिश-युग के निर्माताओं ने इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए केवल गणितीय सुविधा हेतु एक स्थिर सांकेतिक संख्या 20 वर्ष तय की, ताकि जहाँ कहीं भिन्न-आधारित गणना चाहिए, वहाँ स्पष्टता बनी रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि धारा 57 एक संकीर्ण, तकनीकी कल्पना है जो केवल गणितीय उद्देश्यों के लिए है—इसका अर्थ यह नहीं कि आजीवन कारावास वास्तव में 20 वर्ष का होता है या कि 20 वर्ष के बाद बंदी स्वतः रिहा हो जाता है। Gopal Vinayak Godse v. State of Maharashtra (1961) में न्यायालय ने कहा कि आजीवन कारावास का अर्थ है दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग के लिए कारावास, जब तक कि उपयुक्त सरकार अलग प्रावधानों (जैसे CrPC की धाराएँ 432-433) के तहत दंड का रूपांतरण या रिमिशन न दे। बाद में Union of India v. V. Sriharan (2015) में संविधान पीठ ने इसे पुनः पुष्ट किया, यह रेखांकित करते हुए कि धारा 57 के आधार पर 14 या 20 वर्ष को आजीवन सजा की स्वतः पूर्ति नहीं माना जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 57 के कारण आजीवन कारावास पाया व्यक्ति 20 वर्ष बाद स्वतः रिहा हो जाएगा।

    तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि धारा 57 केवल गणनात्मक कल्पना है, जिसका उपयोग अन्य कानूनी उद्देश्यों के लिए सजा के भिन्न निकालने में होता है। वास्तविक रिहाई अब भी अलग क़ानूनों के तहत दी जाने वाली रिमिशन या रूपांतरण पर निर्भर करती है, और सामान्यतः आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग तक कारावास है, जब तक रिमिट न हो।

  • मिथक: धारा 57 आजीवन कारावास की अवधि को 20 वर्ष पर स्थिर कर देती है।

    तथ्य: यह न तो आजीवन सजा की परिभाषा बदलती है, न उसे घटाती है; यह केवल एक सांकेतिक संख्या उपलब्ध कराती है, जब किसी अन्य प्रावधान के तहत सजा का कोई भिन्न निकालना आवश्यक हो।