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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 49

repealed

Year . Month

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जब 1860 में भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान IPC का मसौदा तैयार हुआ, तब उपमहाद्वीप में अनेक पंचांग प्रचलित थे, जैसे हिंदू विक्रम संवत, इस्लामी हिजरी और विभिन्न क्षेत्रीय पंचांग। तिथियों, वाद दायर करने की समय-सीमा, सजा की अवधि और आयु से जुड़ी गणनाओं में भ्रम और विवाद से बचने के लिए, प्रारूपकारों ने संहिता भर में ‘वर्ष’ और ‘माह’ की व्याख्या हेतु एक समान मानक तय करने के उद्देश्य से यह प्रावधान जोड़ा, ताकि पूरे देश में एकरूप और सुसंगत अनुप्रयोग सुनिश्चित हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने जेल सजा, समय-सीमा (लिमिटेशन) और आयु-निर्धारण की गणना करते समय इस प्रावधान को निरंतर शाब्दिक रूप से अपनाया है और ग्रेगोरियन पंचांग का प्रयोग किया है। इसे एक सीधा-सादा व्याख्यात्मक नियम माना गया है जिस पर बहुत कम विवाद हुआ है, क्योंकि यह नए अधिकार या दायित्व पैदा करने के बजाय अस्पष्टता दूर करता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: भारत की अलग-अलग अदालतें स्थानीय या धार्मिक पंचांगों के आधार पर ‘वर्ष’ या ‘माह’ की गणना अलग-अलग कर सकती हैं।

    तथ्य: धारा 49 यह स्पष्ट करती है कि IPC के अंतर्गत सभी प्रयोजनों के लिए ‘वर्ष’ और ‘माह’ हमेशा मानक ब्रिटिश (ग्रेगोरियन) पंचांग के अनुसार समझे जाएंगे, जिससे पूरे देश में एकरूपता बनी रहती है।