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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 478

repealed

Trade Mark.

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जब IPC मूल रूप से 1860 में लिखी गई, तो व्यापार-चिह्न (ट्रेडमार्क) का संरक्षण जालसाज़ी और संपत्ति-चिह्न के साथ दंड संहिता में ही समाहित था। व्यापार के जटिल होने पर संसद ने माना कि व्यापार-चिह्नों के लिए अलग समर्पित क़ानून होना चाहिए; इसलिए 1958 में यह धारा (और झूठा व्यापार-चिह्न उपयोग वाली संबंधित धारा) IPC से हटा दी गई और व्यापार-चिह्न क़ानून को अलग विधि में समेकित किया गया — अंततः ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999, जो आज भी प्रभाव में है। IPC को 1 July 2024 को निरस्त कर भारतीय न्याय संहिता, 2023 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जो अब इन अपराधों पर लागू होती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: IPC की धारा 478 आज व्यापार-चिह्नों की रक्षा नहीं करती।

    तथ्य: यह 1958 में निरस्त कर दी गई थी; अब व्यापार-चिह्न का संरक्षण पूरी तरह ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 से मिलता है।