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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 43

repealed

Illegal . Legally bound to do

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह परिभाषा-धारा भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रारम्भिक अध्याय से है। प्रणेेताओं (मैकॉले के नेतृत्व में) ने संहिता भर में प्रयुक्त समान शब्दों के लिए सटीक और पुनःप्रयोज्य अर्थ तय किए, ताकि ‘अवैध’ और ‘करने के लिए क़ानूनी रूप से बाध्य’ जैसे शब्द हर धारा में दोबारा परिभाषित न करने पड़ें। इससे तब अस्पष्टता नहीं रहती जब संहिता कहती है कि किसी ने ‘अवैध’ रूप से कार्य किया या किसी ऐसे कार्य को नहीं किया जिसके लिए वह ‘क़ानूनी रूप से बाध्य’ था।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने इस परिभाषा का उपयोग उन अपराधों की व्याख्या में किया है जो उपेक्षा (omission) पर आधारित होते हैं—जैसे यह तय करना कि किसी लोक सेवक की निष्क्रियता ‘अवैध’ थी क्योंकि वह सेवा-नियमों द्वारा निषिद्ध थी या उससे सरकार पर दीवानी दावे का जोखिम बना, न कि केवल तब जब वह अपने आप में अलग अपराध हो। यह त्रि-खंडीय परिभाषा (अपराध / क़ानून द्वारा निषिद्ध / दीवानी-दावे का आधार) समग्र मानी जाती है; इसलिए जो किसी भी खंड में न समाए, वह IPC के प्रयोजन से ‘अवैध’ नहीं है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: IPC में ‘अवैध’ केवल उन्हीं कृत्यों को कहा जाता है जो दंडनीय अपराध हों।

    तथ्य: धारा 43 कहती है कि ‘अवैध’ में वे कृत्य भी शामिल हैं जो किसी भी क़ानून से (चाहे वे आपराधिक न हों) निषिद्ध हों, और वे कृत्य या उपेक्षाएँ जो दीवानी वाद का आधार देती हैं।

  • मिथक: ‘करने के लिए क़ानूनी रूप से बाध्य’ का अर्थ नैतिक या सामाजिक कर्तव्य होता है।

    तथ्य: इसका सटीक अर्थ उसी उपेक्षा से है जो त्रि-खंडीय परिभाषा के अनुसार स्वयं ‘अवैध’ हो—अपराध, क़ानून द्वारा निषिद्ध, या दीवानी दावे योग्य—न कि सिर्फ कोई अपेक्षित व्यवहार।