Indian Penal Code, 1860
धारा 403
repealedDishonest misappropriation of property
Whoever dishonestly misappropriates or converts to his own use any movable property, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह धारा उन स्थितियों को समेटती है जहाँ कोई व्यक्ति किसी अन्य की संपत्ति को विधिसंगत या निष्कपट तरीके से अपने अधिकार में ले आता है—जैसे कि वह संपत्ति उसे रास्ते में मिल जाए—परन्तु बाद में उसे लौटाने के बजाय बेईमानी से उसे अपने पास रखने या अपनी बताकर उपयोग करने का निर्णय लेता है। यह चोरी से भिन्न है, क्योंकि चोरी में प्रारम्भ से ही बेईमानी से लेना शामिल होता है; यहाँ बेईमानी बाद में उत्पन्न होती है, जब लौटाने का निर्णय छोड़ दिया जाता है। आपराधिक अपहरण (criminal misappropriation) का यह पृथक अपराध भारतीय दंड संहिता के स्थान पर 2024 में लागू हुई Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में समान संरचना वाले प्रावधान के तहत जारी है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
K.N. Mehra v. State of Rajasthan (1957) में, यद्यपि मुख्य मुद्दा चोरी था, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बेईमानी के इरादे और बिना सहमति किसी अन्य की संपत्ति के अस्थायी उपयोग पर की गई चर्चा को इस धारा के साथ प्रायः उद्धृत किया जाता है, क्योंकि आपराधिक अपहरण में भी केन्द्रबिन्दु यही बेईमाना निर्णय है कि किसी अन्य की संपत्ति को अपनी मान लिया जाए, चाहे उसे लौटाने की कोई योजना रही हो या नहीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना कि जो वस्तु आपको मिली है उसे (चोरी नहीं की) अपने पास रख लेना अपराध नहीं है—गलत है।
तथ्य: किसी ऐसी संपत्ति को, जो स्पष्ट रूप से किसी और की है, बेईमानी से अपने पास रखने या उपयोग करने का निर्णय करना—चाहे वह आपको निष्कपट रूप से मिली हो—एक अलग अपराध है, जिसे आपराधिक अपहरण (criminal misappropriation) कहा जाता है।