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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 36

repealed

Effect caused partly by act and partly by omission

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता (IPC) के निर्माताओं (जिनमें लॉर्ड मैकॉले भी थे) यह स्पष्ट करना चाहते थे कि आपराधिक दायित्व को ‘व्यक्ति ने क्या किया’ और ‘क्या करने में चूक की’ जैसी साफ-सुथरी श्रेणियों में बाँट कर निर्भर नहीं किया जा सकता। अनेक वास्तविक अपराध—जैसे उपेक्षा से किसी को हानि पहुँचाना—में सकारात्मक कृत्य और उपेक्षा दोनों साथ मिलकर काम करते हैं। धारा 36 उस किसी भी छिद्र को बंद करती है जिसमें अपराधी यह दलील दे सके कि क्योंकि हानि शुद्ध कृत्य या शुद्ध उपेक्षा की बजाय मिश्रित आचरण से हुई, इसलिए कोई अपराध बना ही नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतें सामान्यतः इसे स्पष्टीकरणात्मक/व्याख्यात्मक प्रावधान मानती हैं, न कि नया अपराध रचने वाला। इसे विशिष्ट अपराध धाराओं (जैसे चोट, हत्या या उपेक्षा से संबंधित) के साथ लागू किया जाता है ताकि यह पुष्ट हो सके कि केवल यह दिखा देने से कि कारण-श्रृंखला का कुछ हिस्सा निष्क्रियता से जुड़ा था, अभियुक्त दायित्व से नहीं बच सकता। केवल धारा 36 पर टिका कोई एकल ऐतिहासिक निर्णय नहीं है; यह कई निर्णयों में कारण-निर्धारण के विश्लेषण की पृष्ठभूमि में शांति से काम करती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 36 ‘मिश्रित’ आचरण के लिए एक एकदम नया प्रकार का अपराध बनाती है।

    तथ्य: यह कोई नया अपराध नहीं बनाती; यह सिर्फ यह स्पष्ट करती है कि कोई मौजूदा अपराध (जो कृत्य या उपेक्षा से परिभाषित है) तब भी लागू रहता है जब प्रभाव दोनों के मिश्रण से उत्पन्न हो।

  • मिथक: यदि हानि का कुछ हिस्सा उपेक्षा से हुआ, तो उपेक्षा वाला हिस्सा विधि की नज़र में अप्रासंगिक है।

    तथ्य: अदालतें कृत्य और उपेक्षा—दोनों—को मिलकर परिणाम का संयुक्त कारण मानती हैं, इसलिए दोष सिद्ध करने में दोनों हिस्से मायने रखते हैं।