Indian Penal Code, 1860
धारा 34
repealedActs done by several persons in furtherance of common intention -
When a criminal act is done by several persons in furtherance of the common intention of all, each of such persons is liable for that act in the same manner as if it were done by him alone.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
धारा 34 को 1860 के मूल भारतीय दण्ड संहिता का हिस्सा बनाकर तैयार किया गया था। यह संयुक्त दायित्व के अंग्रेज़ी समान्य विधि (common law) के सिद्धांतों पर आधारित है। विधि‑निर्माताओं ने माना कि अपराध अक्सर समूह में किए जाते हैं, जहाँ प्रतिभागियों के बीच काम बाँटे जाते हैं — कोई निगरानी करता है, कोई वार करता है, कोई भागने की योजना बनाता है। ऐसी किसी नियम के बिना, हर व्यक्ति यह कहकर पूर्ण दायित्व से बच सकता था कि उसने तो केवल छोटा‑सा काम किया। ‘सामान्य अभिप्राय’ धारा 34 का वह सूत्र है जो सब प्रतिभागियों को पूरे आपराधिक कृत्य से बाँध देता है और इस कमी को भरता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 34 कोई पृथक अपराध नहीं है, बल्कि संयुक्त दायित्व का नियम है — इसे आरोपित विशिष्ट अपराध (जैसे धारा 302 के अंतर्गत हत्या) के साथ पढ़ा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने Mahbub Shah v. Emperor (1945) और Barendra Kumar Ghosh v. King Emperor (1925) जैसे मामलों में कहा कि ‘सामान्य अभिप्राय’ के लिए पूर्व में मस्तिष्कों का मिलन — पूर्वनियोजित योजना — सिद्ध होना चाहिए; मात्र घटनास्थल पर उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है। न्यायालय ‘सामान्य अभिप्राय’ (साझा योजना, धारा 34) को ‘समान अभिप्राय’ (स्वतंत्र पर समानांतर इरादा, जिस पर धारा 34 लागू नहीं होती) से, और धारा 149 (अवैध जमाव) से भी अलग रखते हैं, जहाँ ‘सामान्य उद्देश्य’ देखा जाता है, न कि सामान्य अभिप्राय।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि धारा 34 एक अलग अपराध है जिसे अकेले ही आरोपित किया जा सकता है।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 34 स्वतंत्र अपराध नहीं है; इसे सदैव उस विशिष्ट अपराध (जैसे चोरी या हत्या) के साथ पढ़ा जाता है जो वास्तव में किया गया।
मिथक: सिर्फ अपराध‑स्थल पर मौजूद होना भर से धारा 34 लागू नहीं हो जाती।
तथ्य: न्यायालय पहले से साझा योजना या ‘मस्तिष्कों के मिलन’ का प्रमाण चाहते हैं; मात्र उपस्थिति, बिना सामान्य अभिप्राय में सहभाग के, पर्याप्त नहीं है (Mahbub Shah v. Emperor)।
मिथक: यह आवश्यक नहीं है कि सभी लोग बिलकुल एक‑सा कृत्य करें ताकि धारा 34 लागू हो।
तथ्य: अलग‑अलग लोग अलग भूमिकाएँ (निगरानी, योजनाकार, क्रियान्वयनकर्ता) निभा सकते हैं और तब भी समान रूप से उत्तरदायी होंगे, बशर्ते सबके कार्य उसी सामान्य अभिप्राय से उपजें।