Skip to content
सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 334

repealed

Voluntarily causing hurt on provocation

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

क़ानून मानता है कि तीव्र और अचानक उकसावे पर लोग हमेशा अपने व्यवहार पर पूरा नियंत्रण नहीं रख पाते। ठंडी, सोची‑समझी हिंसा की तरह ऐसे प्रतिक्रियात्मक कृत्य को समान न मानकर, यह धारा बहुत हल्की सज़ा की अनुमति देती है—बशर्ते प्रतिक्रिया केवल उकसाने वाले पर हो, राहगीरों/दूसरे लोगों पर नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: उकसावा (Provocation) कोई पूर्ण बचाव नहीं है जिससे व्यक्ति बरी हो जाए।

    तथ्य: इससे केवल सज़ा कम होती है; किसी को चोट पहुँचाना अब भी दंडनीय अपराध है—बस अपेक्षाकृत कम—और वह भी तभी जब चोट सिर्फ़ उकसाने वाले व्यक्ति को ही पहुँची हो।