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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 331

repealed

Voluntarily causing grievous hurt to extort confession, or to compel restoration of property

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा, धारा 330 का अधिक कठोर समकक्ष है, और तब लागू होती है जब स्वीकारोक्ति उगलवाने या वसूली कराने के लिए की गई ज़बरदस्ती इतनी बढ़ जाती है कि गंभीर चोट पहुँचती है; इसका तर्क यह है कि ऐसे पूछताछजन्य/जबरी हिंसक कृत्यों से होने वाली गहरी और स्थायी हानि अधिक दायित्व उत्पन्न करती है। ऐतिहासिक रूप से, धारा 330 की तरह, यह भी कड़ी हिरासती यातना तथा हिंसक ऋण/सम्पत्ति वसूली के ख़िलाफ़ एक महत्वपूर्ण कानूनी औज़ार रही है। भारतीय दंड संहिता के स्थान पर आए Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में, यह अपराध अब धारा 120(2) के अंतर्गत आ जाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने इस धारा को, धारा 330 के साथ, हिरासत में होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ केंद्रीय कानूनी सुरक्षा के रूप में माना है, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा उच्च न्यायालयों ने पूछताछ के दौरान हुई गंभीर चोटों वाली पुलिस बर्बरता के मामलों में बार‑बार इन प्रावधानों का हवाला दिया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि पूछताछ के दौरान आधिकारिक हैसियत में काम करने के कारण पुलिस अधिकारियों पर लगी चोटों के लिए आपराधिक दायित्व नहीं ठहराया जा सकता।

    तथ्य: जो पुलिस अधिकारी स्वीकारोक्ति या सूचना निकलवाने के लिए गंभीर चोट पहुँचाते हैं, उन पर किसी निजी व्यक्ति की तरह ही इसी धारा के तहत अभियोग चल सकता है, और अदालतें बार‑बार इस जवाबदेही को लागू करती रही हैं।