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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 30

repealed

Valuable security

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता में ‘मूल्यवान सुरक्षा’ का प्रयोग कई अपराधों—जैसे जालसाज़ी, धोखा, और चोरी—में होता है, जहाँ अपराध की वस्तु नकद नहीं बल्कि किसी कानूनी अधिकार या दायित्व का प्रतिनिधित्व करने वाला कागज़ होता है। धारा 30 को व्यापक और कार्यात्मक परिभाषा देने के लिए बनाया गया ताकि प्रतिज्ञा-पत्र, बांड, शेयर प्रमाणपत्र, बंधक विलेख, रसीदें और ऐसे ही साधन, उनके नाम की परवाह किए बिना, तब तक आच्छादित रहें जब तक वे कानूनी अधिकारों को प्रभावित करते हैं या दायित्व की स्वीकृति दर्ज करते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने प्रायः इस परिभाषा को व्यापक और कार्यात्मक रूप से पढ़ा है, शीर्षक या रूप पर नहीं, बल्कि इस पर ध्यान देकर कि क्या दस्तावेज़ कानूनी अधिकारों को प्रभावित करता है या कोई स्वीकृति दर्ज करता है। जाली शेयर प्रमाणपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र और बैंक दस्तावेज़ों से जुड़े मामलों में इस परिभाषा को लागू कर ऐसे साधनों को जालसाज़ी (धारा 463 से आगे) और मूल्यवान सुरक्षा के साथ धोखा (धारा 420) जैसे अपराधों के भीतर लाया गया है, और दस्तावेज़ के लेबल से अधिक उसके सार को महत्व दिया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: ‘मूल्यवान सुरक्षा’ का मतलब केवल बहुत अधिक धन-मूल्य वाली चीज़ें, जैसे सोना या नकद, होता है।

    तथ्य: वास्तव में इसका अर्थ किसी भी ऐसे दस्तावेज़ से है जो कानूनी अधिकारों को प्रभावित करता है या देयता की स्वीकृति दर्ज करता है—उसका बाज़ारू मूल्य नहीं, बल्कि उसका कानूनी प्रभाव महत्वपूर्ण है।

  • मिथक: किसी दस्तावेज़ का ‘मूल्यवान सुरक्षा’ माने जाने के लिए उसका असली होना आवश्यक है।

    तथ्य: धारा स्पष्ट रूप से उन दस्तावेज़ों को भी आच्छादित करती है जो केवल ऐसे साधन होने का ‘दिखावा करते हैं’ (purport to be), अतः जाली या नकली दस्तावेज़ भी इसके अंतर्गत आ सकते हैं।